उत्तर भारत के एक छोटे-से गाँव चंद्रपुर में एक पुराना नीम का पेड़ था। इतना पुराना कि गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे—“जब हम पैदा भी नहीं हुए थे, तब भी यह पेड़ था।”
दिन में वह पेड़ बिल्कुल साधारण लगता था, लेकिन रात होते ही उसके आस-पास से कोई गुजरने की हिम्मत नहीं करता था।
क्योंकि…
वहाँ रहती थी एक भूतनी।
गाँव वाले उसे डर से “नीम के पेड़ वाली भूतनी” कहते थे।
गाँव की मान्यता
लोगों का मानना था कि आधी रात को नीम के नीचे सफ़ेद साड़ी में एक औरत दिखाई देती है। उसके बाल खुले रहते, पैर ज़मीन से थोड़े ऊपर होते और आँखें…
आँखें ऐसी जैसे किसी ने सालों से रोना नहीं छोड़ा हो।
कहा जाता था कि अगर कोई आदमी रात को उस रास्ते से गुज़र जाए, तो वह ज़िंदा वापस नहीं आता।
लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।
आरव का आगमन
एक दिन शहर से एक लड़का गाँव आया—आरव।
वह पत्रकार था और अंधविश्वासों पर लेख लिखता था। उसे नीम वाले पेड़ की कहानी बहुत दिलचस्प लगी।
गाँव वालों ने बहुत समझाया—
“बेटा, जान प्यारी है तो मत जाना।”
आरव मुस्कराया—
“मैं भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता”
उसी रात उसने तय किया कि वह नीम के पेड़ के पास जाएगा।
आधी रात का दृश्य
रात के ठीक बारह बजे।
चारों तरफ़ सन्नाटा।
नीम के पत्ते बिना हवा के हिल रहे थे।
अचानक…
एक ठंडी हवा चली।
और तभी…
आरव ने उसे देखा।
सफ़ेद साड़ी, खुले बाल, झुका हुआ सिर।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन उसने भागने के बजाय आवाज़ दी—
“क…कौन हो तुम?”
धीरे-धीरे वह आकृति उसकी ओर मुड़ी।
भूतनी की आवाज़
उसकी आवाज़ डरावनी नहीं थी…
बल्कि बहुत उदास थी।
“तुम भी मुझे देखने आए हो… जैसे बाकी सब?”
आरव हैरान रह गया।
भूतनी बोल रही थी… वो भी सामान्य इंसान की तरह।
“तुम… तुम किसकी आत्मा हो?” आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा।
भूतनी कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“मेरा नाम अनन्या है।”
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अनन्या की कहानी
करीब 30 साल पहले अनन्या इसी गाँव में रहती थी।
वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बेहद संवेदनशील लड़की थी।
उसका सपना था—शिक्षिका बनना।
लेकिन गाँव के ठाकुर विक्रम सिंह उसे जबरन शादी के लिए मजबूर करना चाहता था।
अनन्या ने मना कर दिया।
और यही उसकी सबसे बड़ी गलती बन गई।
वह रात
एक अमावस्या की रात…
अनन्या खेत से लौट रही थी।
उसी नीम के पेड़ के पास—
विक्रम और उसके आदमियों ने उसे घेर लिया।
उसने मदद के लिए चीखा…
लेकिन गाँव सो रहा था।
अगली सुबह गाँव वालों ने उसकी लाश नीम के पेड़ से लटकी पाई।
और कहानी फैला दी गई—
“लड़की ने आत्महत्या कर ली।”
आत्मा की अधूरी इच्छा
अनन्या बोली—
“मैं मरी नहीं थी आरव… मुझे मारा गया था।”
उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे, लेकिन ज़मीन पर पहुँचने से पहले ही हवा में गायब हो जाते।
“मेरी आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक सच्चाई बाहर नहीं आएगी।”
डर नहीं, न्याय
आरव की आँखों में अब डर नहीं था।
सिर्फ़ गुस्सा और दुख था।
“तुम किसी को मारती क्यों नहीं?” उसने पूछा।
अनन्या ने हल्की-सी मुस्कान दी—
“मैं भूतनी हूँ… राक्षस नहीं।”
सच्चाई का खुलासा
आरव ने अपनी पूरी ताकत लगा दी।
पुराने रिकॉर्ड निकाले।
बुज़ुर्गों से बात की।
सबूत इकट्ठा किए।
आख़िरकार सच्चाई सामने आई।
विक्रम सिंह को सज़ा मिली।
पूरा गाँव सन्न रह गया।
आख़िरी मुलाकात
उस रात आरव फिर नीम के पेड़ के पास गया।
अनन्या वहाँ खड़ी थी, लेकिन आज उसके चेहरे पर शांति थी।
“धन्यवाद,” उसने कहा।
धीरे-धीरे उसका शरीर रोशनी में बदलने लगा।
“अब मैं जा सकती हूँ।”
आरव की आँखें भर आईं
अनन्या मुस्कराई।
और हवा में विलीन हो गई।
आज भी…
आज भी नीम का पेड़ खड़ा है।
लेकिन अब कोई भूतनी नहीं दिखती।
गाँव वाले कहते हैं—
“वह भूतनी नहीं थी…
वह न्याय की प्रतीक्षा करती एक आत्मा थी।”
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