उस लड़की का नाम अनन्या था। उम्र लगभग पच्चीस साल। पढ़ाई में तेज़, स्वभाव से मिलनसार और अपने करियर को लेकर बहुत गंभीर। कई सालों की मेहनत के बाद आखिरकार उसे एक सरकारी स्कूल में टेम्परेरी टीचर की पोस्ट मिल गई। भले ही पोस्ट अस्थायी थी, लेकिन अनन्या के लिए यह किसी सपने से कम नहीं थी।
स्कूल शहर के बाहर थोड़ी सुनसान जगह पर बना हुआ था। पुरानी इमारत, ऊँची दीवारें और चार मंज़िला ढांचा। पहले ही दिन अनन्या ने महसूस किया कि स्कूल का माहौल थोड़ा अलग है—कुछ उदास, कुछ बोझिल।
कुछ ही दिनों में अनन्या की बाकी शिक्षकों से अच्छी दोस्ती हो गई। लंच टाइम में सब साथ बैठते, बातें करते और हँसते। लेकिन एक बात थी, जो हर बातचीत के बीच बार-बार सामने आ जाती—
चौथे माले का कमरा।
एक दिन स्टाफ रूम में किसी ने धीरे से कहा,
“वैसे… तुम चौथे फ्लोर पर कभी मत जाना।”
अनन्या ने हैरानी से पूछा,
“क्यों? वहाँ क्या है?”
सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। फिर एक सीनियर टीचर बोली,
“कहते हैं वहाँ एक कमरा है… haunted।”
अनन्या हल्के से मुस्कुरा दी।
“मैडम, भूत-प्रेत पर आज भी लोग विश्वास करते हैं?”
तब एक और टीचर ने गंभीर आवाज़ में कहा,
“ये अफवाह नहीं है। सालों पहले एक टीचर ने वहाँ आत्महत्या की थी। उसी कमरे में।”
बताया गया कि उस पुरानी टीचर का नाम सरला देवी था। शांत स्वभाव की, लेकिन बहुत अकेली। एक दिन अचानक वो स्कूल से गायब हो गई। बाद में उसकी लाश उसी कमरे में पंखे से लटकी मिली। तब से चौथा माला बंद कर दिया गया।
ना कोई टीचर जाता था, ना कोई स्टूडेंट।
अनन्या ने ये सब सुनकर भी विश्वास नहीं किया।
उसके मन में उल्टा एक सोच आ गई।
“अगर मैं डर दिखाऊँगी तो हमेशा टेम्पररी ही रह जाऊँगी,” उसने सोचा।
“अगर मैं साबित कर दूँ कि यह सब अफ़वाह है, तो शायद प्रिंसिपल मुझे परमानेंट कराने में मदद करें।”
अगले दिन अनन्या ने सबके सामने एलान कर दिया,
“मैं आज चौथे माले वाले कमरे में जाऊँगी… और कुछ देर वहाँ रुकूँगी भी। ताकि सबको पता चले कि ये सिर्फ अफवाह है।”
स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया।
किसी ने कहा, “पागल मत बनो।”
किसी ने कहा, “मत जाओ, अनन्या।”
लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी।
शाम का समय था। स्कूल लगभग खाली हो चुका था।
सिर्फ कुछ टीचर चौथे माले पर उस हॉन्टेड कमरे से कुछ दूरी पर खड़े थे—डरे हुए, लेकिन उत्सुक।
अनन्या आगे बढ़ने लगी।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती जा रही थी, हवा ठंडी होती जा रही थी।
कमरे के पास पहुँचते ही उसे अजीब-सी बदबू महसूस हुई—पुराने, सड़े हुए कमरे जैसी।
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वह कमरा सामने ही था।
दरवाज़ा आधा खुला हुआ।
अनन्या ने अंदर झाँका।
कमरा खाली था। धूल जमी हुई, टूटी कुर्सी, और एक पुराना पंखा।
“देखा… कुछ भी नहीं है,” उसने नीचे खड़े टीचर्स की ओर देखकर कहा।
जैसे ही वह अंदर पूरी तरह गई—
धड़ाम!
दरवाज़ा अपने-आप ज़ोर से बंद हो गया।
अनन्या घबरा गई।
उसने दरवाज़ा खटखटाया,
“अरे… ये क्या मज़ाक है? दरवाज़ा खोलो!”
लेकिन बाहर खड़े टीचर्स भी हैरान थे।
उन्होंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की—पर वो खुल ही नहीं रहा था।
तभी अनन्या की नज़र ऊपर गई।
पंखे से एक औरत की लाश लटकी हुई थी।
अनन्या की साँस रुक गई।
वो लाश वहाँ पहले नहीं थी।
लाश के चेहरे पर सूखा हुआ खून, गर्दन टेढ़ी, और पैर ज़मीन से कुछ इंच ऊपर।
“न… नहीं…” अनन्या पीछे हटने लगी।
अचानक…
लाश की आँखें खुल गईं।
काली, गहरी और गुस्से से भरी हुई।
उसके मुँह से ज़ोर-ज़ोर की हँसी निकलने लगी।
ऐसी हँसी, जो इंसान की नहीं हो सकती।
अनन्या चीखने लगी,
“बचाओ! कोई है! दरवाज़ा खोलो!”
बाहर टीचर्स दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन जैसे कोई अदृश्य ताकत उसे पकड़े हुए थी।
लाश धीरे-धीरे पंखे से नीचे उतरी।
उसके पैर ज़मीन को छुए बिना आगे बढ़ रहे थे।
“इस कमरे में जो आया… वो कभी वापस नहीं गया,”
भूतनी ने कहा।
कमरे की लाइट अपने-आप बंद हो गई।
बाहर से अनन्या की चीखें कुछ देर तक आती रहीं…
फिर सब कुछ शांत हो गया।
करीब पंद्रह मिनट बाद—
दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
सब टीचर अंदर भागे।
और जो उन्होंने देखा…
उसने सबकी रूह हिला दी।
अनन्या खुद पंखे से लटकी हुई थी।
बिल्कुल उसी तरह…
जैसे सालों पहले सरला देवी लटकी मिली थी।
उसके चेहरे पर डर नहीं था…
बल्कि अजीब-सी मुस्कान थी।
उस दिन के बाद स्कूल कुछ ही महीनों में बंद हो गया।
कहा जाता है—
अब उस कमरे में दो आत्माएँ भटकती हैं।
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