एक विशाल और हरा-भरा जंगल हुआ करता था। उस जंगल में तरह-तरह के जानवर रहते थे—शेर, हिरण, बंदर, खरगोश, मोर, और न जाने कितने छोटे-बड़े जीव। लेकिन उन सबसे में सबसे अलग और सबसे ताकतवर था एक विशाल हाथी, जिसका नाम था गजराज।
गजराज अपनी अपार शक्ति के लिए पूरे जंगल में मशहूर था। उसके बड़े-बड़े दांत, मजबूत सूँड और भारी-भरकम शरीर से सभी जानवर डरते थे। लेकिन समस्या उसकी ताकत नहीं थी, बल्कि उसका घमंड था। उसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था कि वह खुद को जंगल का सबसे बड़ा राजा समझने लगा था।
गजराज अक्सर जंगल में चलते हुए छोटे जानवरों का मज़ाक उड़ाता।
“तुम छोटे और कमजोर जीव इस जंगल में रहने लायक भी नहीं हो,”
वह खरगोशों से कहता।
हिरणों को डराता, बंदरों को धमकाता और चीख-चीख कर कहता,
“मेरे सामने कोई भी टिक नहीं सकता।”
छोटे जानवर उसकी ताकत के सामने चुप रह जाते। वे जानते थे कि गजराज से टकराना बेकार है। लेकिन जंगल में कुछ ऐसे जीव भी थे, जो भले ही आकार में छोटे थे, पर बुद्धि और एकता में बहुत बड़े थे—चींटियाँ।
जंगल के एक कोने में चींटियों का एक बड़ा सा बिल था। वे दिन-रात मेहनत करतीं, अनाज जमा करतीं और मिल-जुलकर रहतीं। उन्हें गजराज के घमंड की खबर थी, लेकिन उन्होंने कभी उससे उलझने की कोशिश नहीं की।
एक दिन की बात है। तेज धूप में गजराज जंगल से गुजर रहा था। चलते-चलते वह एक पुराने पेड़ के पास रुका। अनजाने में उसका भारी पैर चींटियों के बिल पर पड़ गया। कई चींटियों का घर उजड़ गया, रास्ते बंद हो गए और अनाज बिखर गया।
चींटियाँ बाहर आईं और विनम्रता से बोलीं,
“महाराज, कृपया ध्यान से चलिए। आपने हमारा घर तोड़ दिया है।”
गजराज ज़ोर से हँसा।
“अरे! तुम जैसी नन्हीं चींटियाँ भी मुझसे बात करने की हिम्मत करती हो?”
उसने घमंड से कहा,
“मैं चाहूँ तो एक ही कदम में तुम्हें कुचल सकता हूँ।”
चींटियों की रानी आगे आई और शांत स्वर में बोली,
“शक्ति का मतलब दूसरों को कुचलना नहीं होता, महाराज।”
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यह सुनकर गजराज को और गुस्सा आ गया।
“तुम मुझे उपदेश दोगी?”
कहते हुए उसने अपनी सूँड से ज़मीन पर ज़ोर से प्रहार किया और आगे बढ़ गया।
चींटियाँ बहुत दुखी हुईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। रानी ने सभी चींटियों को बुलाया और कहा,
“हम छोटे हैं, पर कमज़ोर नहीं। अगर कोई हमें नीचा दिखाएगा, तो हम उसे सबक सिखाएँगे।”
अगले दिन गजराज नदी की ओर पानी पीने जा रहा था। रास्ते में उसने फिर से वही पुराना रास्ता चुना—जहाँ चींटियों का बिल था। इस बार चींटियाँ तैयार थीं।
जैसे ही गजराज ने अपना पैर ज़मीन पर रखा, सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों चींटियाँ उसके पैरों पर चढ़ गईं। कुछ उसकी सूँड पर, कुछ कानों में और कुछ आँखों के पास।
गजराज घबरा गया।
“अरे! ये क्या हो रहा है?”
वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।
चींटियों ने उसे काटना शुरू कर दिया। चींटियों की संख्या इतनी ज़्यादा कि गजराज का हाल बेहाल हो गया। वह दौड़ने लगा, पेड़ों से टकराने लगा, पानी में कूद गया, लेकिन चींटियाँ उसके शरीर से उतरने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
कुछ देर बाद गजराज थककर ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों में आँसू थे। दर्द से कराहते हुए वह बोला,
“मुझे माफ कर दो! मैंने तुम्हें कमजोर समझकर बहुत बड़ी गलती की।”
चींटियों की रानी आगे आई और बोली,
“हमने तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि सबक सिखाने के लिए ऐसा किया है। ताकत का घमंड हमेशा विनाश लाता है।”
गजराज को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसने सिर झुकाकर कहा,
“आज मुझे समझ आ गया कि छोटा होना कमजोरी नहीं होती। मैं वादा करता हूँ कि आगे से कभी किसी को कमजोर समझकर अपमान नहीं करूँगा।”
चींटियाँ धीरे-धीरे उसके शरीर से उतर गईं। दर्द भी कम होने लगा। गजराज उठा और सबसे पहले उसने चींटियों के टूटे हुए बिल को अपने पैरों और सूँड की मदद से ठीक किया। आसपास से पत्ते, मिट्टी और अनाज लाकर उनका घर फिर से बना दिया।
उस दिन के बाद गजराज पूरी तरह बदल गया। वह अब छोटे जानवरों की मदद करता, उन्हें रास्ता देता और उनका सम्मान करता। जंगल में फिर से शांति और खुशी लौट आई।
अब सभी जानवर जानते थे कि
असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि विनम्रता और समझदारी में होती है।
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