एक समय की बात है। पहाड़ियों से घिरे एक छोटे-से गाँव में एक गरीब लेकिन ईमानदार लकड़हारा रहता था। उसका नाम था हरिराम। हरिराम के पास न तो बहुत धन था और न ही कोई बड़ी संपत्ति, लेकिन उसके पास जो सबसे बड़ी चीज़ थी, वह थी उसकी ईमानदारी और मेहनत।
हरिराम रोज़ सुबह जल्दी उठता, अपनी कुल्हाड़ी कंधे पर रखता और पास के घने जंगल में लकड़ी काटने चला जाता। पूरे दिन कड़ी मेहनत करके वह थोड़ी-सी लकड़ी इकट्ठा करता और उसे बाज़ार में बेचकर अपना और अपने परिवार का गुज़ारा करता।
जंगल के बीचों-बीच एक गहरी और शांत नदी बहती थी। हरिराम उसी नदी के किनारे बैठकर लकड़ी काटता था।
एक दिन, लकड़ी काटते समय अचानक उसकी कुल्हाड़ी हाथ से फिसल गई और सीधे नदी में जा गिरी। नदी बहुत गहरी थी। हरिराम उसे निकाल नहीं सका।
कुल्हाड़ी उसके लिए बहुत कीमती थी। वही उसकी रोज़ी-रोटी का साधन थी। वह नदी के किनारे बैठ गया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“हे भगवान! अब मैं क्या करूँगा?”
वह दुखी होकर बोला।
तभी नदी के पानी में हलचल हुई और एक तेज़ रोशनी चमकी। उसी रोशनी से प्रकट हुई एक सुंदर और दयालु परी। उसके वस्त्र चमक रहे थे और चेहरे पर करुणा थी।
परी ने मधुर स्वर में पूछा,
“हे लकड़हारे, तुम क्यों रो रहे हो?”
हरिराम ने डरते हुए लेकिन सच्चाई से सब कुछ बता दिया।
“महारानी, मेरी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है। उसी से मैं अपने परिवार का पेट पालता हूँ।”
परी ने मुस्कराकर नदी में गोता लगाया और कुछ ही क्षणों में बाहर आई। उसके हाथ में थी एक सोने की कुल्हाड़ी।
परी ने पूछा,
“क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”
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हरिराम ने सिर हिलाकर कहा,
“नहीं देवी, यह मेरी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी लोहे की थी।”
परी फिर से नदी में गई और इस बार चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आई।
“क्या यह तुम्हारी है?”
हरिराम ने फिर ईमानदारी से मना कर दिया।
तीसरी बार परी नदी में गई और इस बार वह लोहे की कुल्हाड़ी लेकर आई।
हरिराम खुशी से बोला,
“हाँ देवी! यही मेरी कुल्हाड़ी है।”
परी बहुत प्रसन्न हुई।
“तुम बहुत ईमानदार हो,”
कहते हुए उसने हरिराम को तीनों कुल्हाड़ियाँ दे दीं।
हरिराम की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने परी को धन्यवाद दिया और प्रणाम किया।
यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। एक लालची लकड़हारे को यह कहानी पता चली। उसने सोचा,
“अगर मैं भी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दूँ, तो मुझे भी सोने की कुल्हाड़ी मिल जाएगी।”
अगले दिन उसने जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
परी प्रकट हुई और पूछा,
“तुम क्यों रो रहे हो?”
लालची लकड़हारे ने झूठी कहानी सुनाई। परी नदी से सोने की कुल्हाड़ी लेकर आई और पूछा,
“क्या यह तुम्हारी है?”
लालची लकड़हारे ने तुरंत कहा,
“हाँ! यही मेरी है।”
परी को उसका झूठ समझ में आ गया। वह क्रोधित हुई और बोली,
“लालच और झूठ का फल कभी अच्छा नहीं होता।”
कहते हुए वह गायब हो गई और लकड़हारे की असली कुल्हाड़ी भी नदी में ही रह गई।
लालची लकड़हारा शर्मिंदा होकर खाली हाथ लौट गया।
हरिराम ने जब यह सुना, तो उसने लालची लकड़हारा को समझाया,
“ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है।”
गाँव में हरिराम की बहुत इज़्ज़त होने लगी। लोग उससे सीख लेने लगे। उसका जीवन अब पहले से बेहतर हो गया, लेकिन उसका स्वभाव वैसा ही सरल और सच्चा रहा।
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