दिल्ली के एक शांत से मोहल्ले में रहने वाली सावित्री आज सुबह कुछ अलग ही उत्साह के साथ उठी। आज करवा चौथ था—वह व्रत, जो हर विवाहित स्त्री अपने पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए करती है। यह सावित्री का शादी के बाद पहला करवा चौथ था, इसलिए उसके मन में खुशी के साथ-साथ थोड़ी घबराहट भी थी।
सावित्री की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। उसके पति अमित एक साधारण लेकिन समझदार इंसान थे। दोनों का रिश्ता प्रेम और आपसी सम्मान पर टिका था। सावित्री मायके से ससुराल आई थी और अब धीरे-धीरे इस नए घर को अपना बना रही थी।
सुबह चार बजे ही उसकी सास शांति देवी ने उसे जगा दिया।
“बहू, सरगी का समय हो गया है,” सास ने प्यार से कहा।
सावित्री ने स्नान किया, सादे कपड़े पहने और सास द्वारा दी गई सरगी खाई। सरगी में फल, मिठाई, दूध और सूखे मेवे थे। सास ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“बेटी, यह व्रत सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम का प्रतीक है।”
सावित्री ने सास के चरण छुए और मन ही मन संकल्प लिया कि वह पूरे मन से यह व्रत निभाएगी।
दिन चढ़ने के साथ-साथ भूख और प्यास बढ़ने लगी। पानी की एक बूँद तक नहीं पीनी थी। दोपहर होते-होते शरीर थकने लगा, लेकिन सावित्री का मन दृढ़ था। वह अपने कमरे में बैठकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करने लगी।
उसे अपनी माँ की याद आई। माँ कहा करती थीं,
“करवा चौथ सिर्फ पति के लिए नहीं, बल्कि स्त्री के धैर्य और आत्मबल की परीक्षा भी है।”
शाम होने से पहले मोहल्ले की सभी महिलाएँ एक जगह इकट्ठा हुईं। सभी ने सुंदर साड़ियाँ पहनी थीं, हाथों में मेहंदी, माथे पर बिंदी और चेहरे पर व्रत का तेज़। सावित्री ने भी लाल साड़ी पहनी, सोलह श्रृंगार किया और पूजा की थाली सजाई।
करवा चौथ की कथा शुरू हुई। कथा सुनाते समय सावित्री का मन बार-बार अमित के चेहरे पर चला जाता। उसे वह दिन याद आया जब अमित ने कहा था,
“सावित्री, अगर तुम्हें कमजोरी लगे तो व्रत मत रखना। तुम्हारी सेहत मेरे लिए ज्यादा जरूरी है।”
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यह सोचकर सावित्री की आँखें भर आईं। उसने महसूस किया कि सच्चा प्रेम सिर्फ परंपराओं में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की चिंता में छिपा होता है।
कथा समाप्त हुई। अब सबकी निगाहें आसमान की ओर थीं। चाँद निकलने का इंतज़ार शुरू हो गया। समय जैसे थम-सा गया था। भूख से सिर भारी हो रहा था, होंठ सूख चुके थे।
तभी अमित कमरे में आया।
“बस थोड़ा सा और, चाँद निकलने वाला है,” उसने मुस्कुराकर कहा।
सावित्री ने पहली बार महसूस किया कि यह व्रत सिर्फ उसका नहीं, बल्कि दोनों का है।
आख़िरकार आसमान में हल्की-सी चाँदनी दिखाई दी।
“चाँद निकल आया!” किसी ने खुशी से आवाज़ लगाई।
सावित्री ने छलनी से पहले चाँद को देखा, फिर अमित को। उस पल उसकी सारी थकान गायब हो गई। उसने पूजा की, फिर अमित ने अपने हाथों से उसे पानी पिलाया और पहला कौर खिलाया।
पानी की एक बूँद जैसे पूरे शरीर में नई ऊर्जा भर गई। सावित्री की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।
अमित ने धीरे से कहा,
“धन्यवाद, लेकिन अगली बार अगर तुम चाहो तो यह व्रत मत रखना। तुम्हारा साथ ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान है।”
सावित्री मुस्कुरा दी।
“यह व्रत मेरे लिए बोझ नहीं, बल्कि प्रेम का उत्सव है,” उसने उत्तर दिया।
उस रात दोनों छत पर बैठे चाँद को देखते रहे। करवा चौथ का चाँद सिर्फ आसमान में नहीं था, बल्कि उनके रिश्ते में भी उजाला भर चुका था।
करवा चौथ उस दिन सावित्री के लिए सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और साथ निभाने का संकल्प बन गया।
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