रागिनी की शादी को तीन साल हो चुके थे। वह एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और आधुनिक सोच रखने वाली महिला थी। गुरुग्राम की एक आईटी कंपनी में काम करने वाली रागिनी के लिए ज़िंदगी हमेशा टाइमलाइन और टारगेट्स में बँटी रहती थी। लेकिन आज का दिन कुछ अलग था—आज करवा चौथ था।
रागिनी की आँख खुली तो घड़ी में सुबह साढ़े चार बज रहे थे। बगल में सो रहे उसके पति आदित्य ने करवट बदली और नींद में ही बुदबुदाया,
“इतनी जल्दी क्यों उठ रही हो?”
रागिनी मुस्कुरा दी।
“आज करवा चौथ है।”
आदित्य ने आँखें खोलीं और हल्की चिंता के साथ कहा,
“रागिनी, मैंने पहले भी कहा है, अगर तुम व्रत न रखना चाहो तो कोई ज़रूरत नहीं। सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है।”
रागिनी ने शांति से उत्तर दिया,
“मैं मजबूरी में नहीं, अपनी मर्ज़ी से रख रही हूँ। परंपरा और आधुनिकता दोनों साथ चल सकती हैं।”
यह सुनकर आदित्य मुस्कुरा दिया।
रागिनी नहाकर तैयार हुई और सास सुधा जी के साथ सरगी खाने बैठी। सास ने प्यार से कहा,
“बेटी, मुझे खुशी है कि तुम हमारी परंपराओं को सम्मान देती हो, बिना खुद को खोए।”
सरगी में फल, मिठाई और दूध था। रागिनी ने मन ही मन संकल्प लिया कि आज का व्रत सिर्फ पति की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि अपने रिश्ते की गहराई को महसूस करने के लिए भी है।
दिन चढ़ता गया। ऑफिस का काम हमेशा की तरह व्यस्त था। मीटिंग्स, कॉल्स और ईमेल्स के बीच भूख और प्यास धीरे-धीरे असर दिखाने लगी। दोपहर में सिर थोड़ा भारी हो गया, लेकिन रागिनी ने खुद को संभाला।
एक पल के लिए उसे अपनी माँ की याद आई। माँ कहा करती थीं,
“बेटी, करवा चौथ सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और विश्वास का प्रतीक है।”
शाम होते-होते ऑफिस से छुट्टी मिली। घर पहुँचकर रागिनी ने लाल साड़ी पहनी, हाथों में मेहंदी देखी और आईने में खुद को निहारा। उसे लगा जैसे आज वह सिर्फ एक प्रोफेशनल महिला नहीं, बल्कि एक पत्नी, एक बहू और एक परंपरा की वाहक भी है।
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मोहल्ले की महिलाएँ एक साथ इकट्ठा हुईं। किसी ने नई साड़ी पहनी थी, किसी ने पुराने गहने, लेकिन सबके चेहरे पर एक ही भावना थी—आस्था और प्रेम। रागिनी पहली बार इतनी ध्यान से करवा चौथ की कथा सुन रही थी।
कथा में रानी करवा का प्रसंग आया—जिसने अपने पति के प्राण बचाने के लिए यमराज से भी सामना किया। यह सुनकर रागिनी के मन में एक सवाल उठा—क्या आज के समय में प्रेम का अर्थ बदल गया है?
उसे एहसास हुआ कि प्रेम का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उसका भाव नहीं।
कथा समाप्त हुई। अब सबकी निगाहें आसमान की ओर थीं। बादल छाए हुए थे और चाँद दिखाई नहीं दे रहा था। समय बीतता जा रहा था। रागिनी को कमजोरी महसूस होने लगी।
तभी आदित्य उसके पास आया और बोला,
“बैठ जाओ, मैं तुम्हारे पास हूँ।”
रागिनी ने उसका हाथ थाम लिया। उस स्पर्श में उसे सुकून मिला।
“आज समझ आया कि यह व्रत सिर्फ पत्नी की परीक्षा नहीं, पति की जिम्मेदारी भी है,” रागिनी ने धीमे से कहा।
करीब आधे घंटे बाद अचानक बादलों के बीच से चाँद झलक पड़ा।
“चाँद निकल आया!” किसी ने खुशी से कहा।
रागिनी ने छलनी उठाई। पहले चाँद को देखा, फिर आदित्य को। उस पल उसे लगा जैसे पूरी दुनिया शांत हो गई हो। उसने पूजा पूरी की।
आदित्य ने अपने हाथों से उसे पानी पिलाया।
“अब खत्म हुआ व्रत,” उसने मुस्कुराकर कहा।
पानी की पहली बूँद गले से उतरते ही रागिनी की आँखें भर आईं।
“धन्यवाद… सिर्फ आज नहीं, हर दिन मेरा साथ देने के लिए,” उसने कहा।
आदित्य ने जवाब दिया,
“रिश्ते बराबरी से चलते हैं। अगर तुम मेरे लिए व्रत रखती हो, तो मेरी भी जिम्मेदारी है कि मैं तुम्हारा सम्मान करूँ।”
रात को दोनों छत पर बैठे चाँद को देख रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी। रागिनी ने सोचा—करवा चौथ अब उसके लिए सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा दिन बन गया था जहाँ प्रेम, समझ और समानता एक साथ जुड़ गए थे।
रागिनी का करवा चौथ उसे यह सिखा गया कि प्रेम भूख-प्यास से नहीं, बल्कि सम्मान और साथ से जीवित रहता है।
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