बहुत समय पहले की बात है। एक समृद्ध राज्य था, जहाँ धन, अन्न और प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। उस राज्य का राजा वंश परंपरा से गद्दी पर बैठा था, लेकिन उसमें शासन करने की योग्यता बहुत कम थी। वह स्वभाव से आलसी, जल्दबाज़ और बिना सोचे-समझे निर्णय लेने वाला था। उसे विद्या, नीति और अनुभव से कोई विशेष लगाव नहीं था। उसे केवल यह अच्छा लगता था कि लोग उसे राजा कहें और उसकी आज्ञा का पालन करें।
राजा के दरबार में एक मंत्री था, जो देखने में अत्यंत बुद्धिमान प्रतीत होता था। वह मधुर वाणी बोलता, राजा की हर बात में सहमति जताता और समय-समय पर उसकी प्रशंसा करता रहता था। राजा को ऐसा मंत्री बहुत प्रिय था, क्योंकि वह कभी राजा की गलतियों की ओर संकेत नहीं करता था। राजा यही समझता था कि उसका मंत्री बहुत नीतिवान और चतुर है।
परंतु वास्तव में वह मंत्री भी उतना ही बुद्धिहीन था, जितना राजा। वह स्वयं निर्णय लेने में असमर्थ था और राजा की प्रसन्नता बनाए रखने को ही अपनी सबसे बड़ी सफलता मानता था। राज्य की वास्तविक समस्याओं, प्रजा के दुख-दर्द और भविष्य की योजनाओं से उसे कोई सरोकार नहीं था।
एक दिन राजा के मन में एक अजीब विचार आया। उसने सोचा कि उसे ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे पूरे राज्य में उसकी बुद्धिमत्ता की चर्चा हो। उसने मंत्री को बुलाया और कहा, “मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे बहुत बड़ा विद्वान समझें। कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे मेरी प्रसिद्धि बढ़े।”
मंत्री ने बिना सोचे-समझे कहा, “महाराज, यदि आप हर विषय पर तुरंत निर्णय लेने लगें, तो लोग आपकी तीव्र बुद्धि की प्रशंसा करेंगे।” राजा को यह बात बहुत अच्छी लगी। उसने उसी क्षण से बिना विचार किए आदेश देने शुरू कर दिए।
राजा ने पहले आदेश दिया कि राज्य के सभी किसान एक ही दिन में फसल काटें, चाहे फसल पकी हो या नहीं। इससे बहुत-सी फसल नष्ट हो गई। जब प्रजा ने शिकायत की, तो मंत्री ने राजा को समझाने के बजाय कहा कि प्रजा को अनुशासन सिखाना आवश्यक है।
कुछ दिनों बाद राजा ने आदेश दिया कि राज्य के सभी कुओं को एक साथ बंद कर दिया जाए, ताकि लोग पानी की कीमत समझें। इस मूर्खतापूर्ण निर्णय से राज्य में पानी का भारी संकट उत्पन्न हो गया। लोग प्यास से व्याकुल हो उठे। पर राजा और मंत्री दोनों ही इसे अपनी नीति की सफलता मानते रहे।
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धीरे-धीरे राज्य की स्थिति बिगड़ने लगी। व्यापार ठप हो गया, किसान दुखी हो गए और लोग राज्य छोड़कर अन्य स्थानों की ओर जाने लगे। पड़ोसी राज्यों के शासकों ने भी इस अव्यवस्था को देख लिया और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
उसी समय राज्य में एक वृद्ध विद्वान रहता था, जो पहले राजा के पिता का सलाहकार रह चुका था। वह लंबे समय से चुपचाप सब देख रहा था। अंततः उसने दरबार में आने की अनुमति माँगी। राजा ने अनिच्छा से उसे बुलाया।
विद्वान ने राजा से सीधा प्रश्न किया, “महाराज, क्या आपने कभी अपने निर्णयों के परिणामों पर विचार किया है?” राजा ने गर्व से कहा कि वह बिना देर किए निर्णय लेता है, यही उसकी विशेषता है। विद्वान ने शांत स्वर में कहा कि बिना विचार लिया गया निर्णय बुद्धिमानी नहीं, बल्कि मूर्खता का संकेत होता है।
विद्वान ने उदाहरण देकर समझाया कि राजा का मंत्री भी उसे सही मार्ग नहीं दिखा रहा, बल्कि केवल उसकी हाँ में हाँ मिलाकर राज्य को विनाश की ओर ले जा रहा है। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गया, परंतु दरबार में उपस्थित कुछ अन्य दरबारियों ने भी विद्वान की बात का समर्थन किया।
राजा पहली बार सोच में पड़ गया। उसने देखा कि वास्तव में राज्य की स्थिति दयनीय हो चुकी है। तब उसे समझ आया कि बुद्धिहीन राजा और बुद्धिहीन मंत्री मिलकर राज्य को नहीं चला सकते।
राजा ने तुरंत मंत्री को पद से हटा दिया और विद्वान को अपना सलाहकार बनाया। धीरे-धीरे राज्य में सुधार होने लगा, पर जो क्षति हो चुकी थी, उसे पूरी तरह भर पाना संभव नहीं था। राजा को जीवन भर इस बात का पछतावा रहा कि उसने समय रहते सही सलाह नहीं ली।
नीति / सीख
बुद्धिहीन राजा और चापलूस मंत्री मिलकर राज्य और समाज दोनों को विनाश की ओर ले जाते हैं। सच्ची बुद्धिमत्ता सोच-समझकर निर्णय लेने और सही सलाह स्वीकार करने में है।
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