घने जंगलों से घिरे एक छोटे-से गाँव में दो लकड़हारे रहते थे। दोनों ही दिन-भर जंगल में लकड़ी काटते और शाम को अपने-अपने घर लौट आते। देखने में दोनों समान लगते थे, पर उनके स्वभाव बिल्कुल अलग थे।
पहला लकड़हारा धैर्यवान, परिश्रमी और ईमानदार था। वह मानता था कि मेहनत का फल धीरे ही सही, पर सच्चा मिलता है।
दूसरा लकड़हारा चालाक, लालची और अवसरवादी था। वह हमेशा सोचता रहता कि कैसे कम मेहनत में ज़्यादा धन कमाया जाए।
एक दिन स्वर्ग लोक की एक परी पृथ्वी पर उतरी। वह यह जानना चाहती थी कि आज के समय में भी क्या ईमानदारी जीवित है या नहीं। उसने निश्चय किया कि वह दोनों लकड़हारों की परीक्षा लेगी। इसके लिए उसने एक प्रतापी, धनवान राजा का वेश धारण किया—राजसी वस्त्र, सोने का मुकुट और शाही ठाठ-बाट।
राजा का पहला आगमन
राजा के वेश में परी सबसे पहले ईमानदार लकड़हारे के पास पहुँची।
“हे लकड़हारे,” राजा ने गंभीर स्वर में कहा, “मुझे अपनी राजधानी में एक विशाल और सुंदर लकड़ी की मूर्ति स्थापित करनी है। क्या तुम सात दिनों में मेरी एक मजबूत, आकर्षक और टिकाऊ मूर्ति बना सकते हो?”
लकड़हारे ने हाथ जोड़कर कहा,
“महाराज, यदि आप मुझे समय देंगे और मेरी मेहनत पर विश्वास करेंगे, तो मैं अपनी पूरी क्षमता से प्रयास करूँगा।”
राजा संतुष्ट हुआ और बोला,
“सात दिन बाद मैं लौटूँगा।”
यह कहकर वह वहाँ से चला गया।
दूसरे लकड़हारे की बारी
इसके बाद राजा दूसरे लकड़हारे के पास पहुँचा और वही बात दोहराई।
दूसरा लकड़हारा राजा के ठाठ-बाट को देखकर मन ही मन सोचने लगा, ‘यह राजा तो अपार धन का स्वामी लगता है। अगर मैं इसे खुश कर दूँ, तो जीवन भर की कमाई एक ही बार में हो सकती है।’
वह ज़ोर से बोला,
“महाराज, आपकी मूर्ति इतनी सुंदर होगी कि देखने वाला दंग रह जाएगा।”
राजा ने मुस्कुराकर वही कहा,
“सात दिन बाद मिलते हैं।”
सात दिन की मेहनत
अगले सात दिन पहले लकड़हारे ने पूरी निष्ठा से काम किया। उसने जंगल में जाकर शीशम की मजबूत और कीमती लकड़ी चुनी। लकड़ी काटते समय उसने उसकी उम्र, मजबूती और गुणवत्ता सब पर ध्यान दिया। दिन-रात मेहनत कर उसने एक ऐसी मूर्ति बनाई जो साधारण होते हुए भी गरिमा और शक्ति का प्रतीक थी।
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वहीं दूसरी ओर, दूसरा लकड़हारा जल्दीबाज़ी में था। उसने सोचा, ‘राजा को लकड़ी की पहचान थोड़े ही होगी।’
उसने सस्ती और हल्की चीड़ की लकड़ी चुनी और ऊपर से चमकदार दिखने वाली मूर्ति बना दी। बाहर से मूर्ति सुंदर थी, लेकिन भीतर से कमजोर।
राजा की वापसी
सातवें दिन राजा वापस आया। सबसे पहले वह ईमानदार लकड़हारे के घर पहुँचा।
मूर्ति देखकर वह कुछ देर तक चुप रहा। फिर बोला,
“बताओ, तुम इसके बदले क्या चाहते हो?”
लकड़हारे ने विनम्रता से कहा,
“महाराज, मैंने जितनी मेहनत की है और जिस लकड़ी का उपयोग किया है, उसी के अनुसार आप जो उचित समझें, वही दे दीजिए।”
इसके बाद राजा दूसरे लकड़हारे के पास पहुँचा। मूर्ति देखने के बाद उसने वही प्रश्न पूछा।
दूसरा लकड़हारा तुरंत बोला,
“महाराज, इस अद्भुत मूर्ति के बदले मुझे एक लाख स्वर्ण सिक्के चाहिए।”
राजा ने कुछ नहीं कहा और दोनों मूर्तियों को पास ही रखे दीमकों के एक बड़े झुंड के बीच रख दिया।
सच का खुलासा
कुछ ही समय में चमत्कार हो गया।
सारे दीमक चीड़ की लकड़ी की मूर्ति पर टूट पड़े, उसे खोखला करने लगे।
लेकिन शीशम की लकड़ी की मूर्ति को उन्होंने छुआ तक नहीं।
राजा का चेहरा कठोर हो गया।
उसने दूसरे लकड़हारे को डाँटते हुए कहा,
“तुमने लालच में सच्चाई और गुणवत्ता को त्याग दिया। बाहर की सुंदरता के पीछे भीतर की कमजोरी छिपा दी।”
इतना कहकर राजा ने अपना असली रूप दिखाया।
पल भर में वह राजा नहीं, बल्कि एक दिव्य तेज से चमकती परी बन गई।
इनाम और दंड
यह दृश्य देखकर दोनों लकड़हारे स्तब्ध रह गए।
परी ने पहले लकड़हारे की ओर देखा और मधुर स्वर में कहा,
“तुमने ईमानदारी, धैर्य और परिश्रम को नहीं छोड़ा। इसलिए मैं तुम्हें एक करोड़ (10,000,000) स्वर्ण सिक्के पुरस्कार में देती हूँ।”
स्वर्ण सिक्कों का ढेर देखते ही लकड़हारे की आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।
फिर परी ने दूसरे लकड़हारे की ओर देखा और कहा,
“लालच इंसान की समझ छीन लेता है। तुमने अवसर को धन में बदलना चाहा, लेकिन चरित्र खो दिया।”
इतना कहकर परी अंतर्ध्यान हो गई।
अंत
पहला लकड़हारा खुशी-खुशी धन लेकर अपने घर लौट गया और उसका जीवन सुखमय हो गया।
दूसरा लकड़हारा वहीं बैठकर रोता रहा, यह सोचते हुए कि अगर उसने भी ईमानदारी अपनाई होती, तो आज उसका भाग्य कुछ और होता।
कहानी की सीख:
👉 सच्ची मेहनत और ईमानदारी कभी व्यर्थ नहीं जाती।
👉 लालच पल-भर का सुख देता है, लेकिन जीवन-भर का पछतावा छोड़ जाता है।
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