एक छोटे-से गाँव के किनारे, घने जंगल के पास एक लकड़हारा रहता था। उसका घर मिट्टी की दीवारों और टूटी हुई छप्पर से बना था। उसी कच्ची-सी झोपड़ी में उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे रहते थे। लकड़हारा बेहद गरीब था, लेकिन उसका मन बहुत साफ था। उसके पास धन नहीं था, पर मेहनत करने वाले हाथ और सच्चा दिल ज़रूर था।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाता। पत्नी बासी रोटी को दो हिस्सों में बाँटती—एक बच्चों के लिए और एक उसके लिए। कई बार ऐसा भी होता कि बच्चों को खिलाने के बाद उसके हिस्से में कुछ नहीं बचता। वह बिना कुछ कहे पानी पीता और जंगल की ओर चल पड़ता।
दिन भर वह कुल्हाड़ी से पेड़ काटता, लकड़ियाँ बाँधता और शाम को उन्हें गाँव में बेचता। बदले में जो थोड़ा-बहुत धन मिलता, उससे जैसे-तैसे घर चलता। फिर भी कई रातें ऐसी आतीं जब चूल्हा नहीं जलता था। उन रातों में उसकी पत्नी बच्चों को सीने से लगाकर सुला देती और लकड़हारा अंधेरे में चुपचाप आकाश की ओर देखता रहता।
एक रात उसकी सहनशक्ति टूट गई। बच्चों के भूखे चेहरे और पत्नी की सूनी आँखें देखकर उसका हृदय भर आया। वह बाहर आँगन में बैठ गया, हाथ जोड़कर बोला—
“हे भगवान, मुझसे ऐसा कौन-सा पाप हो गया कि मुझे यह जीवन मिला? अगर मेरी तक़दीर में दुख ही लिखा है तो सह लूँगा, पर मेरे बच्चों और पत्नी को सुख दे दो। उन्हें भूखा मत रखो, प्रभु।”
उस रात उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
अगली सुबह का चमत्कार
अगली सुबह वह भारी मन से जंगल गया। पेड़ काटते-काटते अचानक उसकी नज़र एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे पड़ी। वहाँ एक तेजस्वी ऋषि-मुनि पद्मासन में बैठे तपस्या कर रहे थे। उनका चेहरा शांत था और पूरे वातावरण में एक अद्भुत शांति फैली हुई थी।
लकड़हारा उन्हें देखकर ठहर गया। उसने कुल्हाड़ी नीचे रखी, हाथ जोड़कर प्रणाम किया और चुपचाप आगे बढ़ने लगा। तभी पीछे से मधुर लेकिन गंभीर आवाज़ आई—
“वत्स, रुको।”
लकड़हारा पलटा।
“तुम क्या करते हो, बेटा?” ऋषि ने पूछा।
“महाराज, मैं लकड़हारा हूँ। लकड़ियाँ काटकर अपने परिवार का पालन करता हूँ,” उसने विनम्रता से उत्तर दिया।
ऋषि बोले,
“मुझे आज बहुत भूख लगी है। मेरी कुटिया पास ही है, चूल्हा भी तैयार है, लेकिन लकड़ी नहीं है। क्या तुम कुछ लकड़ियाँ दे सकते हो ताकि मैं भोजन बना सकूँ?”
लकड़हारा एक पल के लिए रुका। वह जानता था कि जितनी देर यहाँ रुकेगा, उतनी देर काम कम होगा। लेकिन फिर उसने बिना सोचे कहा—
“हाँ महाराज, अभी लाता हूँ।”
मेहनत की शुरुआत
वह जल्दी से जंगल में गया, लकड़ियाँ काटीं और थोड़ी देर में गठरी बनाकर ले आया। ऋषि उसे अपनी कुटिया में ले गए। जैसे ही उन्होंने सारी लकड़ियाँ चूल्हे में डालीं, अजीब बात हुई—
सारी लकड़ियाँ एक ही बार में धधककर जल गईं, और भोजन अभी भी कच्चा रह गया।
ऋषि बोले,
“वत्स, लगता है लकड़ी कम पड़ गई। फिर से ले आओ।”
लकड़हारा बिना कुछ बोले फिर जंगल गया। पसीने से भीगा शरीर, थके हाथ—फिर भी उसने लकड़ियाँ काटीं और ले आया।
लेकिन जैसे ही चूल्हा जलाया गया, वही हुआ। लकड़ियाँ पल भर में राख बन गईं, पर भोजन नहीं पका।
तीसरी बार… चौथी बार…
हर बार वही दृश्य।
ईमानदारी की परीक्षा
ऋषि ने उसे दस बार लकड़ियाँ लाने भेजा।
न लकड़हारे ने सवाल किया,
न नाराज़ हुआ,
न थकान की शिकायत की।
हर बार वह जंगल गया, लकड़ियाँ काटीं और ले आया।
उसके मन में बस एक ही विचार था—
“अगर किसी भूखे संत का पेट भर सकता हूँ, तो यही सबसे बड़ा पुण्य है।”
दसवीं बार लकड़ियाँ लाने के बाद, जब फिर से आग जली और भोजन नहीं पका, तब ऋषि ने आँखें खोलीं। उनके चेहरे पर तेज़ फैल गया। पूरा कुटिया प्रकाश से भर गई।
भगवान का प्रकट होना
ऋषि धीरे-धीरे उठे और बोले—
“वत्स, अब तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई।”
पल भर में ऋषि का रूप बदल गया।
वह भगवान विष्णु थे।
लकड़हारा भय और श्रद्धा से काँप गया। वह ज़मीन पर गिर पड़ा, आँखों से आँसू बहने लगे।
भगवान विष्णु बोले—
“तुमने बिना किसी लालच, बिना प्रश्न किए, ईमानदारी और कर्तव्य से सेवा की। तुम्हारा हृदय शुद्ध है। मैं तुम्हारी प्रार्थना सुन चुका हूँ।”
उन्होंने अपना हाथ उठाया।
क्षण भर में दस करोड़ (100,000,000) स्वर्ण मुद्राएँ प्रकट हो गईं।
साथ ही, लकड़हारे की टूटी-फूटी झोपड़ी भव्य महल में बदल गई।
भगवान बोले—
“अब तुम्हारा परिवार कभी भूखा नहीं रहेगा। इस धन का उपयोग सदाचार से करना।”
इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए।
सुखद अंत
लकड़हारा दौड़ता हुआ घर पहुँचा।
जो उसने देखा, उस पर विश्वास नहीं हुआ।
जहाँ कभी कच्ची कुटिया थी, वहाँ अब सुंदर महल था।
उसकी पत्नी रेशमी वस्त्रों में थी।
बच्चे हँसते हुए खेल रहे थे।
उसकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। उसने भगवान को मन ही मन प्रणाम किया।
अब वह अमीर था, लेकिन उसका दिल वही गरीब-सा सादा और ईमानदार रहा।
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