छोटे से कस्बे शिवपुर में एक पुराना सा घर था। इसी घर में पले-बढ़े थे आरव और मीरा—एक-दूसरे के बिना अधूरे, और सच्चे भाई-बहन।
आरव बचपन से ही शरारती था। हर समय कुछ न कुछ नया करने की सोचता रहता। वहीं मीरा शांत, समझदार और भावुक थी। वह अपने भाई की हर हरकत पर नजर रखती, कभी डाँटती तो कभी प्यार से समझाती। माँ अक्सर कहा करती थीं,
“मीरा, तू तो आरव की दूसरी माँ है।”
बचपन में दोनों ने साथ पतंग उड़ाई, गलियों में क्रिकेट खेला, और स्कूल से लौटते समय चुपके से गोलगप्पे भी खाए। जब भी आरव किसी मुश्किल में पड़ता, सबसे पहले मीरा ही उसे बचाने आती।
समय ने बदली राहें
समय बीतता गया। पढ़ाई पूरी होने के बाद आरव को शहर में नौकरी मिल गई। पहली बार वह घर से इतना दूर जा रहा था। स्टेशन पर विदाई के समय मीरा की आँखें भर आईं, लेकिन उसने मुस्कराकर कहा,
“जल्दी-जल्दी बड़ा आदमी बन जाना, लेकिन अपनी बहन को मत भूलना।”
आरव हँसते हुए बोला,
“तू चिंता मत कर, हर भाई दूज पर तेरा तिलक कराने जरूर आऊँगा।”
शहर की ज़िंदगी तेज़ थी। काम, जिम्मेदारियाँ और सपनों की दौड़ में आरव व्यस्त होता चला गया। फोन कम होने लगे, मिलने के मौके भी घटते गए। मीरा समझती थी, लेकिन दिल कहीं न कहीं उदास हो जाता।
एक कठिन दौर
एक साल ऐसा आया जब आरव की नौकरी चली गई। उसने यह बात घर पर किसी को नहीं बताई। उसे लगा कि अगर मीरा को पता चला तो वह परेशान हो जाएगी। वह भीतर ही भीतर टूट रहा था, लेकिन चेहरे पर मजबूती का मुखौटा लगाए हुए था।
उधर मीरा भी अपने जीवन की लड़ाइयाँ लड़ रही थी। पिता की तबीयत खराब रहने लगी थी। घर की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। फिर भी भाई दूज आने पर उसके चेहरे पर वही पुरानी चमक लौट आई।
उसने आरव को फोन किया,
“इस बार जरूर आना भैया, बहुत मन कर रहा है।”
फोन के उस पार आरव कुछ पल चुप रहा। जेब खाली थी, मन भारी था। फिर भी बोला,
“हाँ, आऊँगा।”
भाई दूज का दिन
भाई दूज की सुबह मीरा ने पूरे घर को सजाया। आँगन में रंगोली बनाई, थाली में तिलक, चावल और मिठाई सजा दी। हर आहट पर वह दरवाज़े की ओर देखने लगती।
शाम होते-होते आरव आया। पहले से थोड़ा दुबला, आँखों में थकान थी, लेकिन मुस्कान वही पुरानी। मीरा ने जैसे ही उसे देखा, दौड़कर गले लग गई।
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“कितना बदल गया है तू,” उसने कहा।
आरव ने हँसने की कोशिश की,
“शहर की हवा लग गई होगी।”
मीरा ने भाई को आसन पर बैठाया। माथे पर तिलक लगाया, आरती उतारी और मन ही मन उसकी हर परेशानी दूर होने की प्रार्थना की। फिर दोनों साथ बैठकर खाना खाने लगे।
सच्चाई का खुलासा
खाना खाते समय मीरा ने गौर किया कि आरव बहुत कम बोल रहा है। उसने धीरे से पूछा,
“सब ठीक है न भैया?”
आरव कुछ पल चुप रहा। फिर जैसे बाँध टूट गया। उसने अपनी नौकरी छूटने की बात, अकेलापन और डर सब कुछ बता दिया। बोलते-बोलते उसकी आँखें भर आईं।
मीरा ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू अकेला नहीं है भैया। जब तक मैं हूँ, तू कभी कमजोर नहीं होगा।”
उसने अपनी छोटी सी बचत आरव के हाथ में रख दी।
“ये पैसे नहीं, भरोसा है। जब संभल जाओ, लौटा देना।”
आरव फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे एहसास हुआ कि असली ताकत वही रिश्ता है, जो मुश्किल में साथ खड़ा रहे।
नया विश्वास
अगले कुछ महीनों में आरव ने नई नौकरी ढूँढ ली। पहले से बेहतर। उसने फिर से आत्मविश्वास पाया। हर सफलता में उसे मीरा की आँखों की वो चमक याद आती, जो भाई दूज वाले दिन दिखी थी।
इस बार भाई दूज पर आरव पहले ही आ गया। हाथ में उपहार था और दिल में कृतज्ञता। मीरा ने तिलक लगाते हुए कहा,
“देखा, मुश्किलें आईं और चली गईं।”
आरव मुस्कराया,
“क्योंकि मेरी बहन मेरे साथ थी।”
कहानी की सीख
भाई दूज केवल तिलक और मिठाई का त्योहार नहीं है। यह उस रिश्ते का नाम है, जो बिना शर्त साथ देता है। आरव और मीरा की कहानी हर उस भाई-बहन की कहानी है, जो दूर रहकर भी दिल से जुड़े रहते हैं।
यह त्योहार याद दिलाता है कि जीवन की सबसे बड़ी दौलत रिश्ते होते हैं—खासकर भाई-बहन का रिश्ता, जो समय, दूरी और हालात से कभी कमजोर नहीं पड़ता।
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