एक हरे-भरे जंगल के किनारे एक छोटा-सा गाँव था। उसी गाँव के पास एक साफ़-सुथरी झोपड़ी में एक माँ बकरी अपने सात नन्हे बच्चों के साथ रहती थी। बकरी अपने बच्चों से बहुत प्यार करती थी और हमेशा उन्हें समझदारी से रहने की सीख देती थी। सातों बच्चे अलग-अलग स्वभाव के थे—कोई शरारती, कोई डरपोक, कोई समझदार—लेकिन सभी अपनी माँ की बात मानते थे।
एक दिन माँ बकरी ने अपने बच्चों से कहा,
“बच्चो, आज मुझे जंगल के बाज़ार से खाने-पीने का सामान लाने जाना है। मेरी गैरमौजूदगी में दरवाज़ा किसी के लिए मत खोलना, खासकर भेड़िये के लिए। वह बहुत चालाक है और तुम्हें धोखा दे सकता है।”
सब बच्चों ने एक साथ कहा,
“हम किसी के लिए दरवाज़ा नहीं खोलेंगे माँ!”
माँ बकरी उन्हें समझाकर जंगल की ओर चली गई।
जंगल में एक चालाक और भूखा भेड़िया रहता था। उसे पता था कि बकरी के सात बच्चे घर पर अकेले हैं। वह मन ही मन बोला,
“आज तो मेरी दावत पक्की है।”
भेड़िया सीधा बकरी की झोपड़ी के दरवाज़े पर पहुँचा और मीठी आवाज़ में बोला,
“बच्चो, मैं तुम्हारी माँ हूँ। दरवाज़ा खोलो।”
अंदर से सबसे बड़े बच्चे ने कहा,
“नहीं! हमारी माँ की आवाज़ इतनी भारी नहीं होती। तुम ज़रूर भेड़िया हो।”
भेड़िया गुस्से में दाँत पीसते हुए चला गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह पास के बाज़ार गया और वहाँ से चाक (सफेद पत्थर) खाकर अपनी आवाज़ पतली कर ली।
फिर वह दोबारा आया और बोला,
“बच्चो, मैं ही तुम्हारी माँ हूँ। मेरी आवाज़ सुनो।”
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बच्चों को आवाज़ माँ जैसी लगी, लेकिन एक बच्चे ने समझदारी से कहा,
“अगर आप हमारी माँ हैं, तो अपना पैर दिखाइए।”
भेड़िये का पैर काला था। बच्चों ने तुरंत पहचान लिया और कहा,
“तुम हमारी माँ नहीं हो। हमारी माँ के पैर सफेद हैं।”
भेड़िया फिर नाकाम हो गया। अब वह और भी ज़्यादा चालाकी करने लगा। वह आटे की चक्की पर गया और अपने पैरों पर सफेद आटा लगा लिया।
तीसरी बार वह दरवाज़े पर आया। बच्चों ने पैर देखा—सफेद! और आवाज़ भी माँ जैसी! बच्चों ने दरवाज़ा खोल दिया।
दरवाज़ा खुलते ही भेड़िया अंदर घुस आया। बच्चे डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। कोई पलंग के नीचे छिपा, कोई अलमारी में, कोई पर्दे के पीछे, कोई चूल्हे के पास। भेड़िया एक-एक करके छह बच्चों को अपने बैग में डालता गया। सातवाँ सबसे छोटा बच्चा चक्की के अंदर छिप गया, इसलिए बच गया।
भेड़िया बैग लेकर अपने घर को चल दिया। जंगल में चलते-चलते उसे थकावट हो गई इसलिए वो एक और पेड़ के नीचे जाकर सो गया।
कुछ समय बाद माँ बकरी घर लौटी। उसने झोपड़ी का हाल देखा—दरवाज़ा टूटा हुआ, घर अस्त-व्यस्त। उसने आवाज़ दी,
“बच्चो!”
कोई जवाब नहीं आया। तभी सबसे छोटा बच्चा बाहर निकला और रोते हुए सारी बात बता दी।
माँ बकरी का दिल टूट गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह जल्दी से अपने छोटे बच्चे को लेकर जंगल में भेड़िये को ढूंढने निकली।
उसने उसने पेड़ के नीचे सोते हुए भेड़िये को देखा। उसके बैग से बच्चों की हलचल की आवाज़ आ रही थी।
माँ बकरी बोली,
“मेरे बच्चे ज़िंदा हैं!”
उसने कैंची लाई और धीरे से बैग काटा। एक-एक करके छहों बच्चे बाहर निकल आए—सभी सुरक्षित थे।
फिर माँ बकरी ने भेड़िये के बैग में भारी पत्थर भर दिए और बैग सी दिया।
अब माँ बकरी और सभी बच्चे एक झाड़ी के पीछे छुप गए।
थोड़ी देर बाद भेड़िया जागा। उसे बहुत प्यास लगी। उसने पत्थरों से भरा बैग उठाया और नदी की ओर चल दिया।
नदी के पास पहुँचते ही जैसे ही वह झुका, भारी पत्थरों के कारण उसका संतुलन बिगड़ गया और वह नदी में गिर गया।
भेड़िया डूब गया और फिर कभी वापस नहीं आया।
सातों बच्चे अपनी माँ से लिपट गए। माँ बकरी ने कहा,
“बच्चो, देखो—समझदारी, सतर्कता और धैर्य से हर खतरे पर जीत पाई जा सकती है।”
उस दिन के बाद बच्चे हमेशा माँ की बात ध्यान से सुनते और कभी किसी अजनबी पर भरोसा नहीं करते।
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