बहुत समय पहले की बात है। एक घने जंगल के किनारे एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। उस गाँव के अधिकांश लोग जंगल से लकड़ी काटकर अपना जीवन यापन करते थे। उन्हीं में से एक लकड़हारा भी था, जो रोज़ सुबह कुल्हाड़ी लेकर जंगल जाता और शाम तक लकड़ियाँ काटकर उन्हें गाँव में बेचता था। वह मेहनती था, परंतु साधारण बुद्धि का व्यक्ति था और अपने काम के दौरान ज़्यादा सोच-विचार नहीं करता था।
जिस जंगल में वह लकड़हारा काम करता था, वहाँ अनेक बंदर रहते थे। वे पेड़ों पर उछलते-कूदते रहते और मनुष्य के कार्यों को बड़े ध्यान से देखते थे। उन्हीं बंदरों में एक युवा और अत्यंत जिज्ञासु बंदर भी था। उसे हर नई चीज़ को देखने और समझने की आदत थी, पर वह बिना पूरी समझ के नकल करने में विश्वास करता था।
एक दिन लकड़हारा जंगल में एक बड़े और मोटे तने वाले पेड़ को काटने लगा। उसने कुल्हाड़ी से पेड़ पर कई वार किए, जिससे तना बीच से फटने लगा। जब लकड़हारा थोड़ा विश्राम करने के लिए पास ही बैठ गया, तब उसने पेड़ के फटे हिस्से को खुला रखने के लिए बीच में एक लकड़ी का खूंटा फँसा दिया।
लकड़हारा कुछ देर के लिए पानी पीने चला गया। उसी समय बंदरों का झुंड वहाँ आ गया। सभी बंदर लकड़हारे के काम को कौतूहल से देखने लगे। युवा बंदर को यह दृश्य बहुत रोचक लगा। उसने पहले कभी ऐसा नहीं देखा था कि कोई पेड़ को बीच से फाड़ दे और उसमें लकड़ी फँसा दे।
वह बंदर सोचने लगा कि यदि वह भी ऐसा कर पाए, तो वह भी बहुत बुद्धिमान कहलाएगा। अन्य बंदरों ने उसे पास जाने से रोका, पर वह उनकी बात नहीं माना। उसे अपने ऊपर बहुत विश्वास था, जबकि वास्तव में उसे उस काम का कोई ज्ञान नहीं था।
बंदर पेड़ के पास पहुँचा और उसने फटे हुए तने को ध्यान से देखा। वह पेड़ के ऊपर चढ़ गया और फिर नीचे उतरकर उस लकड़ी के खूंटे को खींचने लगा। जैसे ही उसने खूंटा निकाला, पेड़ के दोनों हिस्से आपस में जुड़ गए। दुर्भाग्यवश बंदर की पूँछ उन दोनों हिस्सों के बीच फँस गई।
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अचानक हुए इस दर्द से बंदर ज़ोर से चीखने लगा। वह छटपटाने लगा, पर जितना अधिक हिलता, दर्द उतना ही बढ़ता गया। अन्य बंदर भयभीत होकर दूर हट गए। उन्हें समझ में आ गया कि बिना ज्ञान के किसी के काम की नकल करना कितना खतरनाक हो सकता है।
कुछ ही समय बाद लकड़हारा वापस लौटा। उसने बंदर की दुर्दशा देखी। वह समझ गया कि बंदर ने उसकी नकल करने की कोशिश की है। लकड़हारे को बंदर पर दया आई। उसने सावधानी से पेड़ को फिर से फाड़ा और बंदर की पूँछ को बाहर निकाला।
बंदर दर्द से कराह रहा था, पर वह जीवित बच गया। उसे अपनी मूर्खता पर गहरा पछतावा हुआ। उसने महसूस किया कि केवल देखकर किसी काम को करना बुद्धिमानी नहीं होती। उस दिन के बाद वह बंदर पहले से अधिक सावधान हो गया।
जंगल के अन्य बंदरों ने भी इस घटना से सीख ली। वे अब मनुष्यों के काम में बिना समझ के हस्तक्षेप नहीं करते थे। बंदर की यह कहानी पूरे जंगल में फैल गई और एक उदाहरण बन गई।
नीति / सीख
बिना ज्ञान और अनुभव के किसी के कार्य की नकल करना विनाश का कारण बन सकता है। समझदारी वही है जो सोच-समझकर किया जाए।
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