बहुत समय पहले की बात है। एक घने और हरे-भरे जंगल में अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। उस जंगल का राजा था एक घमंडी शेर, जिसका नाम था सिंहराज। उसकी दहाड़ से पूरा जंगल काँप उठता था। शेर ताकतवर तो था ही, लेकिन उसे अपनी ताकत पर बहुत अभिमान भी था। वह रोज़ किसी न किसी जानवर को डराता और कहता,
“मैं जंगल का राजा हूँ, मेरे हुक्म के बिना कोई साँस भी नहीं ले सकता।”
जंगल के सभी जानवर शेर से भयभीत रहते थे। हिरण, खरगोश, बंदर, यहाँ तक कि हाथी भी उससे बचकर रहते थे। लेकिन जंगल में एक जानवर ऐसा भी था, जो न तो ताकतवर था और न ही बहुत बड़ा—पर उसकी बुद्धि बहुत तेज़ थी। वह थी चालाक लोमड़ी, जिसका नाम था चतुरी।
चतुरी लोमड़ी जंगल में अपनी समझदारी और चतुराई के लिए जानी जाती थी। वह जानती थी कि ताकत से नहीं, बल्कि दिमाग से बड़ी से बड़ी समस्या हल की जा सकती है। वह शेर के घमंड को देखती थी, लेकिन सही मौके का इंतज़ार कर रही थी।
एक दिन सिंहराज ने ऐलान किया,
“अब से रोज़ जंगल का एक जानवर मेरे भोजन के लिए खुद चलकर आएगा।
यह सुनकर जंगल में हाहाकार मच गया। सभी जानवर दुखी और डरे हुए थे। रोज़ किसी एक जानवर की बलि तय होने लगी। सभी मन ही मन रोते, लेकिन कुछ कर नहीं पाते।
एक दिन लोमड़ी चतुरी की बारी आई। वह बहुत शांत थी। दूसरे जानवरों ने पूछा,
“चतुरी, क्या तुम डरी नहीं हो?”
लोमड़ी मुस्कराई और बोली,
“डरने से कुछ नहीं होगा, अब बुद्धि से काम लेने का समय है।”
चतुरी जानबूझकर शेर के पास देर से पहुँची। शेर गुस्से से दहाड़ने लगा,
“इतनी देर क्यों की? क्या तुम्हें अपनी मौत की परवाह नहीं?”
लोमड़ी ने बड़ी विनम्रता से सिर झुकाया और बोली,
“महाराज, देर मेरी गलती से नहीं हुई। रास्ते में एक और शेर मिल गया था, जो खुद को जंगल का राजा बता रहा था। उसने मुझे रोक लिया।”
और हिंदी कहानियाँ पढ़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें।
यह सुनते ही सिंहराज की आँखें लाल हो गईं।
“क्या कहा? मेरे जंगल में दूसरा शेर?”
उसका घमंड जाग उठा।
लोमड़ी बोली,
“हाँ महाराज, वह आपसे भी बड़ा और ताकतवर लग रहा था। उसने कहा कि वही असली राजा है।”
सिंहराज आग-बबूला हो गया।
“मुझे अभी उसके पास ले चलो!”
वह गरजते हुए बोला।
चालाक लोमड़ी उसे जंगल के एक गहरे कुएँ के पास ले गई। कुआँ बहुत पुराना और गहरा था, जिसमें साफ़ पानी भरा हुआ था।
लोमड़ी ने नीचे झाँकते हुए कहा,
“महाराज, वही रहा वह शेर।”
शेर ने जैसे ही कुएँ में झाँका, उसे पानी में अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने समझा कि यह वही दूसरा शेर है।
शेर ज़ोर से दहाड़ा। कुएँ में भी दहाड़ की आवाज़ गूँज उठी। शेर को लगा कि सामने वाला शेर भी उसे चुनौती दे रहा है।
गुस्से में आकर सिंहराज ने ज़ोर से छलाँग लगा दी और कुएँ में गिर पड़ा। गहरे पानी में गिरने से वह बाहर नहीं निकल पाया और उसकी वहीं मृत्यु हो गई।
लोमड़ी चतुरी ने राहत की साँस ली और जंगल की ओर लौट आई।
जब सभी जानवरों को यह खबर मिली, तो पूरे जंगल में खुशी की लहर दौड़ गई। सभी जानवर लोमड़ी के पास आए और बोले,
“तुमने अपनी बुद्धि से पूरे जंगल को बचा लिया।”
लोमड़ी मुस्कराई और बोली,
“याद रखो, ताकत हमेशा सही नहीं होती। सही समय पर सही बुद्धि सबसे बड़ी शक्ति होती है।”
उस दिन के बाद जंगल में कोई राजा नहीं रहा। सभी जानवर आपस में मिल-जुलकर रहने लगे। न कोई डर था, न अत्याचार।
चालाक लोमड़ी चतुरी जंगल की सबसे सम्मानित सदस्य बन गई। लेकिन उसने कभी घमंड नहीं किया। वह हमेशा दूसरों की मदद करती रही।
Go Back to Hindi Kahani
Janvaro Ki Kahani पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें