घने जंगल के किनारे एक हरा-भरा मैदान था। उसी मैदान में कई जानवर मिल-जुलकर रहते थे। जंगल का वातावरण हमेशा चहचहाहट और हलचल से भरा रहता था। उसी जंगल में एक बहुत ही तेज़, फुर्तीला और आत्मविश्वास से भरा खरगोश रहता था। उसे अपनी तेज़ रफ्तार पर बेहद घमंड था। वह अक्सर जंगल के अन्य जानवरों का मज़ाक उड़ाता और कहता,
“इस पूरे जंगल में मुझसे तेज़ कोई नहीं दौड़ सकता!”
उसी जंगल में एक कछुआ भी रहता था। कछुआ स्वभाव से शांत, गंभीर और धैर्यवान था। उसकी चाल बहुत धीमी थी, लेकिन उसका मन मजबूत और विचार साफ़ थे। वह कभी किसी की बातों का बुरा नहीं मानता था और अपने काम में लगा रहता था।
एक दिन खरगोश जंगल के जानवरों के बीच अपनी तेज़ी का बखान कर रहा था। वह बोला,
“देखो, मैं चाहूँ तो हवा से भी तेज़ दौड़ सकता हूँ। कोई है जो मुझसे दौड़ में जीत सके?”
सभी जानवर चुप हो गए। तभी कछुए ने धीमी आवाज़ में कहा,
“अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे साथ दौड़ लगा सकता हूँ।”
यह सुनते ही पूरा जंगल हँसी से गूँज उठा। हिरण, बंदर, लोमड़ी—सब हँसने लगे। खरगोश ज़ोर से हँसते हुए बोला,
“तुम? मुझसे दौड़ोगे? जब तक तुम एक कदम चलोगे, मैं पूरा मैदान पार कर लूँगा!”
कछुए ने शांति से उत्तर दिया,
“तेज़ होना ही सब कुछ नहीं होता। अगर तुम चाहो, तो हम दौड़ कर देख सकते हैं।”
खरगोश को यह बात चुनौती जैसी लगी। उसने तुरंत कहा,
“ठीक है! कल सुबह इस मैदान में दौड़ होगी। देखेंगे कौन जीतता है।”
अगले दिन सुबह-सुबह पूरा जंगल इकट्ठा हो गया। शेर को दौड़ का निर्णायक बनाया गया। दौड़ की शुरुआत और अंत तय की गई। शेर ने ज़ोर से कहा,
“तैयार… और शुरू!”
खरगोश बिजली की तरह दौड़ पड़ा। कुछ ही पलों में वह बहुत आगे निकल गया। पीछे कछुआ अपनी धीमी लेकिन स्थिर चाल से चलता रहा। वह न रुका, न घबराया।
थोड़ी दूर जाकर खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा। कछुआ बहुत पीछे था। खरगोश हँसते हुए बोला,
“अरे! ये तो अभी शुरू ही हुआ है। थोड़ा आराम कर लेता हूँ।”
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पास ही एक पेड़ की छाया थी। खरगोश वहीं लेट गया। उसे पूरा भरोसा था कि वह जब चाहेगा, जीत जाएगा। आराम करते-करते उसकी आँख लग गई।
उधर कछुआ धीरे-धीरे चलता रहा। उसे पता था कि वह तेज़ नहीं है, लेकिन उसने मन ही मन कहा,
“मुझे बस चलते रहना है। रुकना नहीं है।”
धूप तेज़ होती गई, लेकिन कछुआ रुका नहीं। उसके पैरों में दर्द था, थकान थी, फिर भी उसका हौसला कम नहीं हुआ। वह हर कदम के साथ लक्ष्य के और पास पहुँचता गया।
कुछ समय बाद खरगोश की नींद खुली। उसने चौंककर पीछे देखा। कछुआ अब काफ़ी पास आ चुका था। खरगोश घबरा गया और तुरंत दौड़ने लगा। लेकिन देर हो चुकी थी।
कछुआ अंत रेखा के बिल्कुल पास पहुँच चुका था। सारे जानवर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे,
“कछुआ! कछुआ!”
और अगले ही पल कछुआ जीत की रेखा पार कर गया। शेर ने घोषणा की,
“दौड़ का विजेता — कछुआ!”
पूरा जंगल तालियों और खुशी से गूंज उठा। कछुआ थका हुआ था, लेकिन उसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी।
खरगोश शर्मिंदा होकर कछुए के पास आया और बोला,
“मुझे माफ़ कर दो। मैंने अपनी तेज़ी पर घमंड किया और तुम्हें कम आँका।”
कछुए ने मुस्कराते हुए कहा,
“घमंड इंसान को गिरा देता है, और धैर्य उसे आगे बढ़ाता है।”
उस दिन से खरगोश ने कभी किसी का मज़ाक नहीं उड़ाया। उसने सीख लिया कि लगातार प्रयास और धैर्य से ही सफलता मिलती है, न कि केवल तेज़ी और घमंड से।
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