बहुत समय पहले की बात है। एक घना और विस्तृत जंगल था, जहाँ अनेक प्रकार के पशु मिल-जुलकर रहते थे। उस जंगल में हरियाली, जलस्रोत और भोजन की कोई कमी नहीं थी। जंगल के सभी प्राणी शांति से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। परंतु इसी जंगल में एक विशाल और शक्तिशाली हाथी भी रहता था, जो अपने बल और आकार के कारण अत्यंत अहंकारी हो गया था। उसे अपने सामने किसी की कोई कीमत नज़र नहीं आती थी।
हाथी रोज़ जंगल में घूमता और जहाँ उसका मन करता, वहीं से गुज़र जाता। वह छोटे पशुओं के घरों को रौंद देता, पेड़ों को तोड़ देता और जलस्रोतों को गंदा कर देता। यदि कोई पशु उसे रोकने का प्रयास करता, तो वह उसे डराकर भगा देता। धीरे-धीरे जंगल के सभी प्राणी उससे भयभीत हो गए। उनके मन में रोष भी था, लेकिन हाथी की शक्ति के आगे कोई कुछ कहने का साहस नहीं करता था।
एक दिन हाथी ने जंगल के एकमात्र छोटे तालाब को गंदा कर दिया, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहा। इससे जंगल के सभी पशुओं को भारी कठिनाई होने लगी। हिरण, खरगोश, पक्षी और अन्य छोटे जीव प्यास से व्याकुल हो उठे। तब सभी पशुओं ने एक सभा बुलाई और समस्या के समाधान पर विचार करने लगे।
सभा में बड़े-बड़े जानवर भी उपस्थित थे, पर कोई भी हाथी के सामने जाने को तैयार नहीं था। तभी एक छोटा सा खरगोश, जो शांत स्वभाव और तीव्र बुद्धि के लिए जाना जाता था, आगे आया। उसने कहा कि बल से नहीं, बल्कि बुद्धि से अहंकार को हराया जा सकता है। पहले तो सभी पशुओं को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, पर उनके पास कोई और उपाय भी नहीं था।
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खरगोश ने एक योजना बनाई। उसने कहा कि वह स्वयं हाथी से बात करेगा। सभी पशु भयभीत थे, पर खरगोश आत्मविश्वास से भरा हुआ था। अगले दिन वह हाथी के पास पहुँचा। हाथी ने उसे देखा और हँसते हुए कहा, “इतना छोटा प्राणी मेरे पास क्यों आया है? क्या तुम अपने जीवन से ऊब गए हो?”
खरगोश ने विनम्र स्वर में कहा कि वह जंगल के देवता का संदेश लेकर आया है। यह सुनते ही हाथी चौकन्ना हो गया। खरगोश ने कहा कि जंगल के देवता हाथी के अहंकार से बहुत क्रोधित हैं, क्योंकि वह निर्दोष जीवों को कष्ट पहुँचा रहा है। यदि हाथी ने अपना व्यवहार नहीं बदला, तो देवता उसे दंड देंगे।
हाथी ने घमंड में कहा कि वह किसी देवता से नहीं डरता। तब खरगोश ने उसे पास के एक गहरे कुएँ के पास चलने को कहा। वह बोला कि देवता वहीं निवास करते हैं। हाथी उत्सुकता और अहंकार के मिश्रित भाव से खरगोश के पीछे चल पड़ा।
कुएँ के पास पहुँचकर खरगोश ने हाथी से कहा कि वह कुएँ में झाँककर देवता के दर्शन करे। जैसे ही हाथी ने नीचे देखा, उसे पानी में अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने उसे कोई विशाल और क्रोधित जीव समझ लिया। खरगोश ने कहा कि यही जंगल के देवता हैं, जो हाथी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हाथी क्रोध में भर गया और उस परछाईं पर आक्रमण करने के लिए कुएँ में कूद पड़ा। कुआँ बहुत गहरा था। हाथी बाहर नहीं निकल सका और उसका अहंकार वहीं समाप्त हो गया।
कुछ समय बाद जंगल में शांति लौट आई। सभी पशु खरगोश की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करने लगे। उन्होंने समझा कि आकार या शक्ति नहीं, बल्कि विवेक और सोच ही सबसे बड़ा बल होता है। जंगल फिर से सुरक्षित और आनंदमय हो गया।
नीति / सीख
अहंकार सबसे बड़े शक्तिशाली को भी विनाश की ओर ले जाता है, जबकि बुद्धि और विनम्रता से छोटे से छोटा प्राणी भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
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