गाँव के बाहर एक पुरानी टूटी-फूटी हवेली थी, जिसे लोग भूतनी की हवेली कहते थे।
पिछले पचास सालों से कोई वहाँ रहने नहीं गया था। दिन में वह हवेली बस एक जर्जर इमारत लगती थी, लेकिन रात होते ही वहाँ से अजीब-अजीब आवाज़ें आने लगती थीं।
गाँव के बुज़ुर्ग इस हवेली से जुड़ी एक भूतनी की कहानी सुनाते थे।
इस हवेली से जुड़ी कहानी हर पीढ़ी में बदली, लेकिन एक बात हमेशा एक जैसी रही—रात के बारह बजे एक औरत सफ़ेद साड़ी में बाल फैलाए हवेली की बालकनी में दिखाई देती थी।
गाँव में आया एक नया मेहमान
राहुल, एक युवा पत्रकार, शहर से इस गाँव में आया था। उसे रहस्यमयी कहानियों पर लेख लिखने का शौक था। जब उसने गाँव में इस हवेली के बारे में सुना, तो उसकी आँखों में चमक आ गई।
“यही तो चाहिए,” उसने मन ही मन कहा,
“एक असली भूतनी की कहानी!”
गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया।
“बेटा, वहाँ मत जाना। जो गया है, वो या तो पागल हो गया या फिर कभी लौटा ही नहीं।”
लेकिन राहुल डरने वालों में से नहीं था। उसने तय कर लिया कि वह उस हवेली में एक रात ज़रूर बिताएगा।
हवेली में पहला कदम
रात के ठीक दस बजे राहुल टॉर्च, कैमरा और नोटबुक लेकर हवेली के सामने खड़ा था। हवेली का गेट अपने आप चरमराता हुआ खुल गया, जैसे किसी ने अंदर से उसे बुलाया हो।
हवेली के अंदर घुसते ही ठंडी हवा का झोंका आया। दीवारों पर जमी सीलन, टूटी सीढ़ियाँ और मकड़ी के जाले—सब कुछ डरावना था।
अचानक उसे किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई दी।
“कौन है?” राहुल ने आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं।
उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ़ उसका वहम है। आखिर वह एक भूतनी की कहानी सुनकर डरने वालों में से नहीं था।
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आधी रात का सच
रात के बारह बजे अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ ज़ोर से बंद हो गईं। राहुल का कैमरा अपने आप चालू हो गया।
तभी सीढ़ियों से किसी के चलने की आवाज़ आई।
टक… टक… टक…
राहुल का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
और तभी उसने उसे देखा।
एक औरत, सफ़ेद साड़ी में, ज़मीन से कुछ इंच ऊपर तैरती हुई। उसके बाल चेहरे को ढँके हुए थे और आँखें… पूरी तरह काली।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?” उस औरत की आवाज़ सीधे राहुल के दिमाग में गूँजी।
भूतनी का अतीत
राहुल डरते हुए बोला,
“मैं आपकी कहानी जानना चाहता हूँ।”
औरत हँसी। उसकी हँसी में दर्द और गुस्सा दोनों थे।
“तो सुनो मेरी कहानी…”
उसने बताया कि उसका नाम सुधा था। पचास साल पहले उसी हवेली में उसकी शादी हुई थी। शादी की रात उसके पति और ससुराल वालों ने दहेज के लिए उसे ज़िंदा जला दिया।
उसकी आत्मा उसी हवेली में कैद रह गई।
डर का असली रूप
अचानक हवेली की दीवारों पर आग की लपटें दिखाई देने लगीं। राहुल को जलने की बदबू आने लगी। उसे लगा जैसे वह भी आग में घिर गया हो।
“यह सब… यह सब क्या है?” राहुल चिल्लाया।
“यह वही रात है,” भूतनी बोली,
“जो हर रात दोहराई जाती है।”
राहुल अब समझ चुका था कि यह सिर्फ़ एक डरावनी कहानी नहीं, बल्कि एक अधूरी न्याय की पुकार थी।
सुबह की रोशनी
सुबह गाँव वालों ने देखा कि राहुल हवेली के बाहर बेहोश पड़ा था। होश आने पर उसने गाँव वालों को सब कुछ बताया।
“यह कोई अफ़वाह नहीं,” राहुल बोला,
उसके बाद राहुल ने अख़बार में पूरी सच्चाई छापी। मामला फिर से खुला, पुराने गुनहगारों के परिवारों को सज़ा मिली, और पहली बार हवेली में शांति छाई।
कहते हैं, उस दिन के बाद से हवेली से आवाज़ें आनी बंद हो गईं।
लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात आज भी कोई सफ़ेद साड़ी वाली औरत दूर से मुस्कुराती दिखती है।
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