बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल जंगल के बीचों-बीच एक पुराना और घना बरगद का पेड़ खड़ा था। उसकी शाखाएँ चारों दिशाओं में फैली हुई थीं और पत्तों की छाया इतनी घनी थी कि धूप भी मुश्किल से ज़मीन तक पहुँच पाती थी। उसी बरगद के सबसे ऊँचे हिस्से पर एक कौआ अपने परिवार के साथ रहता था। वह मेहनती, सतर्क और अपने बच्चों से अत्यंत प्रेम करने वाला था। उसकी पत्नी भी समझदार थी और दोनों मिलकर अपने घोंसले की देखभाल करते थे।
बरगद के उसी पेड़ की जड़ों के पास ज़मीन के भीतर एक साँप का बिल था। वह साँप बहुत चालाक, क्रूर और अवसरवादी था। दिन में वह अपने बिल में छिपा रहता और रात के समय बाहर निकलता। उसे पता था कि ऊपर पेड़ पर कौए का घोंसला है, जिसमें छोटे-छोटे अंडे और बच्चे हैं। जब भी कौआ और उसकी पत्नी भोजन की तलाश में बाहर जाते, साँप मौका पाकर घोंसले में घुस जाता और अंडे खा जाता।
कौआ और उसकी पत्नी जब लौटते, तो घोंसले को उजड़ा हुआ पाते। यह दृश्य देखकर उनका हृदय टूट जाता। कई बार ऐसा हुआ कि उनके अंडे फूटने से पहले ही नष्ट हो गए। कौआ बहुत दुखी और क्रोधित रहता, परंतु वह जानता था कि साँप उससे अधिक शक्तिशाली है। सीधे टकराव में वह साँप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।
कौए ने कई बार साँप से विनती की। उसने कहा कि वह उसके बच्चों को न मारे और कहीं और चला जाए। पर साँप ने उसकी बातों पर हँसते हुए कहा कि जंगल में कोई नियम नहीं चलता, यहाँ वही जीवित रहता है जो ताकतवर होता है। यह सुनकर कौआ और अधिक निराश हो गया।
एक दिन कौआ ने निश्चय किया कि वह इस समस्या का समाधान खोजेगा। वह अपने पुराने मित्र सियार के पास गया, जो अपनी चतुराई और अनुभव के लिए पूरे जंगल में प्रसिद्ध था। कौए ने सियार को अपनी पूरी व्यथा सुनाई। सियार ने ध्यान से उसकी बात सुनी और फिर मुस्कराते हुए कहा कि हर समस्या का समाधान बल से नहीं, बुद्धि से निकलता है।
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सियार ने कौए को एक योजना समझाई। उसने कहा कि साँप को सीधे नुकसान पहुँचाना कठिन है, लेकिन यदि उसे किसी और के क्रोध का शिकार बना दिया जाए, तो समस्या स्वयं हल हो जाएगी। कौआ पहले तो योजना समझ नहीं पाया, पर सियार ने उसे धैर्य से पूरा उपाय बताया।
कुछ दिनों बाद राजा के महल के पास एक तालाब में रानी अपनी दासियों के साथ स्नान करने आई। उसने अपने कीमती आभूषण किनारे रख दिए। कौआ पहले से ही इस अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। जैसे ही रानी स्नान में व्यस्त हुई, कौआ उड़कर आया और उसके हार को अपनी चोंच में दबाकर उड़ गया।
दासियों ने यह देखा तो शोर मच गया। सैनिक कौए के पीछे दौड़ पड़े। कौआ जानबूझकर धीरे उड़ता हुआ सीधे बरगद के पेड़ की ओर आया। उसने उड़ते-उड़ते हार साँप के बिल के पास गिरा दिया और स्वयं पेड़ पर बैठ गया।
सैनिक जब वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने हार देखा। जैसे ही उन्होंने बिल में झाँका, साँप फुफकारता हुआ बाहर निकला। सैनिकों ने उसे अत्यंत खतरनाक समझा और तुरंत मार डाला। इस प्रकार साँप का अंत हो गया।
कौआ यह सब ऊपर से देख रहा था। उसके मन में न तो घमंड था और न ही क्रूरता का भाव, बल्कि केवल संतोष था कि अब उसके परिवार को कोई खतरा नहीं रहेगा। उसने सियार की बुद्धि को मन-ही-मन धन्यवाद दिया।
इसके बाद कौआ और उसकी पत्नी ने शांति से जीवन बिताया। उनके अंडे सुरक्षित रहे और बच्चे बड़े होकर उड़ना सीख गए। कौए ने यह अनुभव अपने बच्चों को भी सिखाया कि जीवन में हर समस्या का समाधान बल से नहीं, समझदारी से करना चाहिए।
नीति / सीख
जहाँ बल काम न आए, वहाँ बुद्धि और सही योजना से सबसे शक्तिशाली शत्रु को भी पराजित किया जा सकता है।
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