माधव एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। रोज़ की तरह उस दिन भी ऑफिस में काम बहुत ज़्यादा था। फाइलें, कॉल्स और बॉस का दबाव—सब कुछ एक साथ। देखते-देखते रात के 12 बज चुके थे।
माधव को हर हाल में अपने शहर वापस जाना था, इसलिए उसने अपना काम खत्म किया, ऑफिस को बंद किया और जल्दी-जल्दी स्टेशन पहुँचकर आख़िरी ट्रेन पकड़ी।
स्टेशन पर अजीब-सी खामोशी थी।
सिर्फ कुछ पीली लाइटें, दूर-दूर बैठे लोग और गाड़ी के इंजन की भारी आवाज़।
कुछ देर बाद ट्रेन एक छोटे से गाँव के स्टेशन पर रुकी।
एक-एक करके सारे यात्री उतर गए।
अब पूरे डिब्बे में सिर्फ माधव ही बचा।
उसे थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन उसने खुद को समझाया,
“रात है… लोग उतरते रहते हैं।”
ट्रेन फिर चल पड़ी।
डिब्बे में अब सिर्फ पहियों की आवाज़ और हवा की सिसकारी थी।
करीब आधे घंटे बाद ट्रेन एक और स्टेशन पर रुकी।
यह स्टेशन और भी सुनसान था।
अचानक माधव ने देखा—
एक लाल साड़ी पहने औरत डिब्बे में चढ़ी।
उसने पूरी साड़ी में खुद को ढक रखा था और सिर पर घूंघट था।
वह बिना इधर-उधर देखे, सीधा माधव के पास आई और सामने वाली सीट पर बैठ गई।
डिब्बे में रोशनी बहुत कम थी।
औरत का चेहरा बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।
माधव को अजीब लगा।
इतनी रात, सुनसान स्टेशन, अकेली औरत… और उसी डिब्बे में।
उसके दिमाग में कई ख्याल आए—
“कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं?”
फिर उसने खुद को समझाया,
“आजकल लड़कियाँ घर से भाग जाती हैं… शायद वैसा ही कुछ हो।”
थोड़ी देर चुप रहने के बाद माधव ने हिम्मत करके पूछा,
“आप कौन हैं? और कहाँ जा रही हैं?”
औरत बिल्कुल शांत रही।
कोई जवाब नहीं।
माधव को और अजीब लगा।
उसने फिर पूछा,
“क्या आपको किसी मदद की ज़रूरत है?”
फिर भी कोई जवाब नहीं।
माधव ने सोचा,
“शायद शर्मीली है।”
वह अपनी सीट पर लेट गया और आँखें बंद करने की कोशिश करने लगा।
लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
दिल अजीब तरह से तेज़ धड़क रहा था।
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अचानक उसकी नज़र नीचे गई—
औरत के पैरों पर।
और जो उसने देखा…
उसकी रूह काँप गई।
उस औरत के पैर उलटे थे।
एड़ियाँ आगे की ओर…
और उंगलियाँ पीछे।
माधव का शरीर सुन्न हो गया।
पसीना माथे से टपकने लगा।
“ये… ये इंसान नहीं है…”
उसके मुँह से बस इतना ही निकला।
वह एक झटके में उठा और डिब्बे के गेट की ओर भागा।
ट्रेन बहुत तेज़ चल रही थी।
बाहर सिर्फ अंधेरा और हवा की डरावनी आवाज़।
माधव ने डरते-डरते पीछे मुड़कर देखा—
वह औरत धीरे-धीरे उसकी ओर आ रही थी,
लेकिन चलने का तरीका बिल्कुल गलत था।
वह उलटे पैरों से चल रही थी।
अब उसका घूंघट हट चुका था।
माधव की चीख निकल गई।
उसका चेहरा इंसानी नहीं था।
आँखें पूरी तरह काली—जैसे उनमें कोई पुतली ही न हो।
दाँत लंबे, नुकीले।
और नाखून… किसी जानवर की तरह।
उसने भारी आवाज़ में कहा,
“तुम अकेले हो… और मुझे अकेले यात्री बहुत पसंद हैं…”
माधव चिल्लाया,
“बचाओ! कोई है!”
लेकिन पूरा डिब्बा खाली था।
उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन डर से हाथ काँप रहे थे।
अचानक वह औरत एक झटके में उस पर झपटी।
माधव ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसने देखा—
औरत के मुँह से खून टपक रहा था।
“इस ट्रेन में…
रात के बाद जो अकेला सफर करता है…
भूख को शांत करता है…”
भूतनी की हँसी डिब्बे में गूँजने लगी।
अगले ही पल…
सब कुछ शांत हो गया।
अगली सुबह…
सुबह ट्रेन एक बड़े स्टेशन पर खड़ी थी।
एक डिब्बे के बाहर पुलिस की भीड़ लगी हुई थी।
अंदर का नज़ारा दिल दहला देने वाला था।
माधव की लाश ज़मीन पर पड़ी थी।
चेहरे पर लगा खून जम चुका था,
और गर्दन पर गहरे नाखूनों के निशान थे।
पास खड़े कुछ लोग फुसफुसा रहे थे—
“लगता है फिर वही हुआ…”
“हाँ… ट्रेन वाली भूतनी…”
“कई साल पहले भी ऐसे ही अकेले यात्रियों की मौत हुई थी…”
कहा जाता है—
सालों पहले एक औरत को इसी ट्रेन में मार दिया गया था।
उसकी लाश पटरियों के पास मिली थी।
तब से उसकी आत्मा रात की ट्रेनों में भटकती है।
वो सिर्फ उन्हीं डिब्बों में चढ़ती है
जहाँ कोई अकेला यात्री हो।
आज भी लोग कहते हैं—
अगर आधी रात को ट्रेन में
कोई लाल साड़ी वाली औरत
चुपचाप पास आकर बैठ जाए…
तो समझ लेना—
सुबह की रोशनी तुम नहीं देख पाओगे।
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