घर की दीवारों पर दीयों की रोशनी नाच रही थी, लेकिन मीरा के चेहरे पर आज वो चमक नहीं थी। हर साल भाई दूज उसके लिए सबसे खास दिन होता था, पर इस बार दिल कुछ ज़्यादा ही भारी था।
मीरा सुबह से ही रसोई और पूजा के बीच चक्कर काट रही थी। थाली सजा दी गई थी—रोली, चावल, दीपक और कुनाल की पसंद की काजू कतली। सब कुछ वैसा ही था जैसा हर साल होता था, बस एक चीज़ नहीं थी—
कुनाल।
मीरा ने मोबाइल उठाया, फिर रख दिया। पिछले तीन दिनों से वही एक बात दिमाग में घूम रही थी।
“इस बार नहीं आ पाऊँगा मीरा।”
कुनाल ने ये बात फोन पर बहुत साधारण तरीके से कही थी, जैसे भाई दूज कोई आम दिन हो।
“क्यों?”
मीरा ने पूछा था।
“ऑफिस में बहुत काम है। छुट्टी नहीं मिल रही।”
मीरा ने ज़ोर नहीं दिया, लेकिन फोन कटते ही आँखें भर आई थीं। उसे अपने भाई की आवाज़ में कुछ टूटा हुआ-सा लगा था।
कुनाल और मीरा का रिश्ता हमेशा से थोड़ा अलग रहा था। वो सिर्फ़ भाई-बहन नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे की कमजोरी भी थे और ताक़त भी।
जब मीरा बोर्ड की परीक्षा में फेल हुई थी, तो सबने उसे समझाया था—
लेकिन कुनाल ने बस इतना कहा था,
“फेल हुई है, टूटी नहीं है।”
और जब कुनाल नौकरी छूटने के बाद चुप-चुप रहने लगा था, तब मीरा ने बिना पूछे उसके लिए हर रात चाय बनानी शुरू कर दी थी।
उन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
दोपहर होने लगी। माँ ने मीरा से पूछा,
“कुनाल सच में नहीं आ रहा?”
मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“काम में फँसा है माँ।”
माँ कुछ नहीं बोलीं, लेकिन उन्होंने थाली को एक बार फिर ठीक कर दिया—जैसे अभी भी किसी उम्मीद को संभालकर रख रही हों।
मीरा अपने कमरे में आकर बैठ गई। अलमारी से उसने एक पुरानी राखी निकाली—वो राखी जो उसने कॉलेज के पहले साल में कुनाल को भेजी थी।
उस दिन कुनाल ने फोन पर कहा था,
“मीरा, तेरी राखी से ज़्यादा मुझे तेरी दुआ बचाती है।”
आज वही दुआ अधूरी लग रही थी।
शाम होने लगी। बाहर हल्की ठंड थी। दीये जल चुके थे।
मीरा ने सोचा—
“शायद इस बार भाई दूज यूँ ही बीत जाएगा।”
तभी—
डोरबेल बजी।
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मीरा चौंकी।
“इस वक़्त कौन?”
माँ उठकर दरवाज़े की तरफ़ गईं।
दरवाज़ा खुला।
और अगले ही पल—
“मीरा…”
वो आवाज़।
मीरा को लगा जैसे समय थम गया हो।
सामने कुनाल खड़ा था। हाथ में एक छोटा-सा बैग, चेहरे पर हल्की थकान और आँखों में वही पुरानी शरारत।
मीरा कुछ बोल ही नहीं पाई।
“तो… मैं सच में नहीं आ सकता था?”
कुनाल ने मुस्कुराकर पूछा।
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने बिना कुछ कहे कुनाल को ज़ोर से गले लगा लिया।
“झूठ क्यों बोला?”
वो सिसकते हुए बोली।
कुनाल अंदर आया। माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“ठीक तो है न बेटा?”
कुनाल ने सिर हिलाया।
“अब सब ठीक है माँ।”
पूजा के लिए बैठते वक्त मीरा के हाथ काँप रहे थे। उसने कुनाल के माथे पर टीका लगाया, चावल चढ़ाए और दीपक घुमाया।
“भगवान तुझे हमेशा खुश रखे,”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
कुनाल ने मिठाई खाते हुए धीरे से कहा,
“मीरा, मैंने झूठ इसलिए बोला क्योंकि मैं चाहता था कि तू तैयार न हो पाए।”
“मतलब?”
मीरा ने पूछा।
कुनाल ने अपना बैग खोला।
उसमें से एक लिफ़ाफ़ा निकाला।
“ये क्या है?”
मीरा ने हैरानी से पूछा।
“मेरी नई नौकरी का ऑफ़र लेटर,”
कुनाल ने मुस्कुराते हुए कहा।
“पिछले छह महीने बहुत मुश्किल थे। लगा जब तक कुछ बन न जाए, तब तक तेरे सामने कैसे आऊँ?”
मीरा की आँखें फिर भर आईं।
“तू कुछ बने या न बने, तू मेरा भाई है,”
उसने कहा।
कुनाल ने धीरे से कहा,
“मैं जानता था तू दुखी होगी। लेकिन मैं ये भी जानता था कि अगर अचानक आऊँगा, तो तेरी मुस्कान सबसे सच्ची होगी।”
मीरा ने उसके हाथ पर टीका लगा हाथ रख दिया।
“अगली बार ऐसा सरप्राइज़ मत देना,”
वो मुस्कुराते हुए बोली,
“सीधे आ जाया कर।”
कुनाल हँस पड़ा।
रात को छत पर दोनों बैठे थे। ठंडी हवा चल रही थी।
“भाई दूज क्या होता है पता है?”
मीरा ने कहा।
“क्या?”
कुनाल ने पूछा।
“ये वो दिन होता है जब बहन को भरोसा दिलाया जाता है कि चाहे भाई कितनी भी दूर चला जाए, वो कभी अकेली नहीं होगी।”
कुनाल ने आसमान की तरफ़ देखा।
“और भाई को ये एहसास दिलाया जाता है कि उसके पास लौटने के लिए हमेशा एक घर है।”
उस रात मीरा ने थाली संभालकर रख दी।
क्योंकि आज उस थाली में सिर्फ़ टीका और मिठाई नहीं थी—
उसमें इंतज़ार था, डर था, झूठ था,
और अंत में
प्यार से भरा सबसे खूबसूरत सरप्राइज़।
और शायद
यही भाई दूज की असली भावना थी।
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