बहुत समय पहले की बात है। एक विस्तृत जंगल के किनारे एक खुला मैदान फैला हुआ था। यह मैदान हरा-भरा था और आसपास के गाँवों के किसान यहाँ खेती करते थे। इसी मैदान के पास ऊँचे पेड़ों पर कबूतरों का एक बड़ा समूह रहता था। ये कबूतर रोज़ सुबह अपने बसेरे से निकलते, मैदान और खेतों में दाने चुगते और शाम होने पर वापस लौट आते थे। इस झुंड का नेतृत्व एक वृद्ध और अनुभवी कबूतर करता था, जिसे सभी “राजा कबूतर” कहते थे। वह उम्र में बड़ा था, पर उसकी दृष्टि तेज़ और बुद्धि प्रखर थी।
राजा कबूतर अपने जीवन में अनेक संकट देख चुका था। उसने कई बार शिकारी देखे थे और अपने साथियों को हमेशा सावधान रहने की सीख देता रहता था। वह कहता था कि भोजन जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक सावधानी भी है। लेकिन झुंड में कुछ युवा कबूतर ऐसे भी थे जो उसकी बातों को हल्के में लेते थे। उन्हें लगता था कि खतरे की बातें केवल डराने के लिए कही जाती हैं।
एक दिन सुबह-सुबह एक शिकारी उस मैदान में आया। उसके हाथ में एक बड़ा जाल था और मन में लालच भरा हुआ था। उसने देखा कि यहाँ रोज़ बहुत से कबूतर आते हैं। उसने सोचा कि यदि सही ढंग से जाल बिछाया जाए, तो एक ही दिन में बहुत बड़ा शिकार हाथ लग सकता है। उसने ज़मीन पर बहुत सारे दाने बिखेर दिए और उनके ऊपर चुपचाप जाल फैला दिया। फिर वह एक झाड़ी के पीछे छिपकर बैठ गया।
कुछ समय बाद कबूतरों का झुंड आकाश में उड़ता हुआ वहाँ पहुँचा। नीचे बिखरे दानों को देखकर कई कबूतर खुशी से भर उठे। उन्होंने इतनी अधिक मात्रा में दाने पहले कभी नहीं देखे थे। राजा कबूतर ने ऊपर से ही स्थिति को ध्यान से देखा। उसे मैदान में असामान्य शांति और दानों का अस्वाभाविक फैलाव खटक रहा था। उसने झुंड को नीचे उतरने से रोका और सावधान किया।
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लेकिन कुछ युवा कबूतरों ने उसकी बात नहीं मानी। उन्होंने कहा कि हर जगह खतरा देखना ठीक नहीं, और इतनी अच्छी भोजन की जगह को छोड़ना मूर्खता होगी। भूख ने उनकी बुद्धि को ढक लिया था। धीरे-धीरे पूरा झुंड नीचे उतर आया।
जैसे ही कबूतरों ने दाने चुगना शुरू किया, अचानक जाल उनके ऊपर गिर पड़ा। सभी कबूतर जाल में फँस गए। पूरे झुंड में हड़कंप मच गया। कोई पंख फड़फड़ाने लगा, कोई चिल्लाने लगा, तो कोई खुद को दोष देने लगा। जितना अधिक वे छटपटाते, उतना ही जाल कसता जाता।
तभी राजा कबूतर ने ज़ोर से आवाज़ लगाई और सबको शांत रहने को कहा। उसने समझाया कि घबराहट से कोई समाधान नहीं निकलता। उसने सबको एक ही दिशा में और एक साथ उड़ने का आदेश दिया। शुरुआत में कबूतरों को यह असंभव लगा, पर उनके पास कोई और उपाय नहीं था।
सभी कबूतरों ने एक साथ पंख फड़फड़ाए और पूरे बल से उड़ने की कोशिश की। आश्चर्यजनक रूप से जाल उनके साथ ऊपर उठ गया। शिकारी यह देखकर स्तब्ध रह गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि इतने सारे कबूतर मिलकर जाल को उठा सकते हैं। वह उनके पीछे दौड़ा, लेकिन कबूतर आकाश में बहुत ऊपर जा चुके थे।
राजा कबूतर झुंड को सीधे अपने पुराने मित्र, चूहे के बिल की ओर ले गया। चूहा अत्यंत बुद्धिमान और तेज़ दाँतों वाला था। उसने राजा कबूतर की स्थिति समझते ही बिना समय गँवाए जाल को काटना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जाल टूटता गया और सभी कबूतर मुक्त हो गए।
मुक्त होते ही कबूतरों ने चैन की साँस ली। उन्हें अपनी जल्दबाज़ी और मूर्खता पर गहरा पछतावा हुआ। उन्होंने राजा कबूतर से क्षमा माँगी और स्वीकार किया कि यदि वे उसकी बात मान लेते, तो यह संकट कभी नहीं आता। राजा कबूतर ने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाया कि अनुभव और एकता का सम्मान करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।
उस दिन के बाद कबूतरों का झुंड पहले से अधिक सतर्क हो गया। वे कभी भी बिना सोचे-समझे किसी जगह नहीं उतरते थे और अपने नेता की सलाह को गंभीरता से लेते थे। शिकारी भी उस मैदान में दोबारा कभी कबूतरों को नहीं पकड़ सका।
नीति / सीख
जल्दबाज़ी और अहंकार संकट को बुलाते हैं, जबकि एकता, धैर्य और अनुभवी नेतृत्व से सबसे बड़ी मुसीबत से भी बाहर निकला जा सकता है।
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