भारत के एक छोटे-से गाँव में रहने वाला रमेश बहुत ही सादा और नेक दिल इंसान था। उसके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए थे, इसलिए उसके जीवन में सबसे बड़ा सहारा उसकी छोटी बहन सीमा ही थी। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। हालाँकि समय और हालात ने उन्हें अलग-अलग जगह पहुँचा दिया था। रमेश दुकान संभालने के लिए गाँव में ही रह गया था, जबकि सीमा की शादी शहर में हो गई थी।
भाई दूज का पावन त्योहार आने वाला था। जैसे ही त्योहार नज़दीक आया, सीमा को अपने भाई की बहुत याद आने लगी। उसने रमेश को फोन किया और प्यार भरे स्वर में बोली,
“भैया, इस बार भाई दूज मेरे साथ मनाओ। आपके बिना त्योहार अधूरा लगता है।”
रमेश की आँखें भर आईं। उसने तुरंत हाँ कर दी। वह माँ जगदंबा का सच्चा भक्त था और हर काम से पहले उनका नाम ज़रूर लेता था। उसने मन ही मन माता से प्रार्थना की,
“हे माँ, मेरी बहन से मिलने जा रहा हूँ, मेरी रक्षा करना।”
भाई दूज के एक दिन पहले रमेश शहर जाने के लिए तैयार हुआ। उसने अपनी बहन के लिए ढेर सारी मिठाइयाँ खरीदीं—लड्डू, पेड़े, बर्फी और रसगुल्ले। साथ ही कुछ छोटे-छोटे उपहार भी लिए—चूड़ियाँ, साड़ी और पूजा की सामग्री। उसके चेहरे पर एक अलग-सी खुशी थी। उसे लग रहा था जैसे वर्षों बाद जीवन में सच्चा उत्सव लौट आया हो।
वह ट्रेन में बैठा और खिड़की से बाहर देखता हुआ अपनी बहन के साथ बिताए बचपन के पल याद करने लगा। तभी अचानक रात के समय ट्रेन के डिब्बे में कुछ बदमाश घुस आए। उन्होंने यात्रियों को डराना शुरू कर दिया। रमेश ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे बहुत निर्दयी थे। उन्होंने रमेश को बुरी तरह पीटा, उसकी सारी मिठाइयाँ, उपहार और पैसे छीन लिए और चलती ट्रेन से कूदकर भाग गए।
रमेश सीट पर गिर पड़ा। उसके शरीर में दर्द था, दिल में उससे भी ज़्यादा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“अब मैं अपनी बहन के लिए क्या लेकर जाऊँगा?”
“वह सोच रही होगी कि भैया ढेर सारे तोहफे लाए होंगे… अब क्या मुँह दिखाऊँगा?”
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किसी तरह वह शहर पहुँचा और बहन के घर तक गया। दरवाज़ा खुलते ही सीमा ने अपने भाई को घायल हालत में देखा। उसके चेहरे की मुस्कान पल भर में चिंता में बदल गई। उसने तुरंत रमेश को अंदर बिठाया और पूरी घटना सुनी। सुनते-सुनते उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
“भैया, आपको ऐसा हुआ और आप फिर भी मेरे पास आए… मुझे किसी तोहफे की ज़रूरत नहीं,” सीमा ने रोते हुए कहा।
भाई दूज की सुबह हुई। रमेश स्नान करके तैयार हो गया और पूजा घर में बैठ गया फिर सीमा भी स्नान की ओर और पूजा की तैयारी की। सीमा ने थाली सजाई, तिलक, चावल, दीपक और मिठाई रखी। रमेश दर्द के बावजूद मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था।
सीमा ने अपने भाई के माथे पर टीका लगाया, उसकी आरती उतारी और फिर हाथ जोड़कर माँ जगदंबा से प्रार्थना की,
“हे माँ, मेरे भाई को आपने ही मेरे जीवन का रक्षक बनाया है। इसके सारे घाव भर दीजिए, इसका सारा दर्द दूर कर दीजिए।”
जैसे ही उसने प्रार्थना पूरी की, अचानक एक अद्भुत चमत्कार हुआ। रमेश ने महसूस किया कि उसके शरीर का सारा दर्द गायब हो गया है। वह खड़ा हुआ, चलने लगा—अब उसे कहीं कोई चोट नहीं थी।
“सीमा, देखो! मैं ठीक हो गया!”
सीमा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने अपने भाई को गले लगा लिया।
लेकिन रमेश का मन अभी भी भारी था। उसने धीरे से कहा,
“बहन, मुझे बहुत दुख है। मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं ला सका।”
उसने अपनी जेब टटोली—उसमें बस 100 रुपये का एक नोट था। उसने आँखें बंद कीं और मन ही मन माँ जगदंबा से प्रार्थना की,
“हे माता रानी, अगर मैंने सच्चे मन से आपकी भक्ति की है, तो मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपनी बहन को खाली हाथ न रखू।”
जैसे ही उसने आँखें खोलीं, वह हैरान रह गया। उसकी जेब अपने-आप 10000 रुपये से भरी हुई थी। वह घबरा गया, फिर खुशी से भर उठा।
“माँ ने मेरी सुन ली!”
रमेश ने तुरंत वो पैसे अपनी बहन के हाथ में रख दिए और कहा,
“यह पैसे मेरे नहीं, माँ का आशीर्वाद है। इसे स्वीकार करो।”
सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपने भाई की ममता और माँ जगदंबा का चमत्कार देखा था।
उस दिन दोनों ने बाहर से ढेर सारी मिठाइयाँ मंगवाईं, हँसे, बातें कीं और बचपन की यादों में खो गए। भाई दूज का त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम और भक्ति का प्रतीक बन गया।
और इस तरह, माँ जगदंबा की कृपा से यह भाई दूज दोनों के जीवन की सबसे यादगार बन गई।
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