बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे-से गाँव में एक गरीब-सा परिवार रहता था। इस परिवार में पाँच सदस्य थे — परिवार का मुखिया हरिदास, उसकी पत्नी सीता, और उनके तीन छोटे बच्चे। हरिदास एक ईमानदार लेकिन बहुत गरीब व्यक्ति था। वह दिनभर मेहनत-मजदूरी करता, फिर भी इतना नहीं कमा पाता कि परिवार को दो वक्त का भरपेट भोजन मिल सके।
कई-कई दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जलता था। बच्चे भूख से रोते, सीता उन्हें बहलाती और हरिदास मन ही मन खुद को कोसता। वह सोचता,
“मैं कितना भी मेहनत कर लूँ, लेकिन इतना पैसा नहीं कमा पता कि बच्चों को पेट भर खाना खिला सकूँ।”
भूख और मजबूरी
एक दिन हालात इतने खराब हो गए कि घर में एक दाना तक नहीं बचा। बच्चों की आँखों में आँसू थे और पेट में आग लगी हुई थी। सीता ने काँपती आवाज़ में कहा,
“आज अगर कुछ न हुआ, तो बच्चों की हालत और बिगड़ जाएगी।”
हरिदास का दिल भर आया। वह बच्चों को लेकर गाँव के पुराने भगवान गणेश मंदिर पहुँचा। मंदिर सादा था, लेकिन वहाँ अपार शांति थी।
परिवार ने भूखे पेट, हाथ जोड़कर प्रार्थना की,
“हे विघ्नहर्ता गणेश! हम धन नहीं माँगते, बस इतना आशीर्वाद दीजिए कि हमारे बच्चों को भरपेट भोजन मिल जाए।”
आँखों से आँसू बहते रहे और वे वहीं सिर झुकाकर बैठ गए।
भगवान गणेश का सपना
उसी रात हरिदास गहरी नींद में था। तभी उसने स्वप्न देखा। चारों ओर उजाला फैल गया और उसके सामने भगवान गणेश प्रकट हुए। उनका मुख करुणा से भरा हुआ था।
गणेश जी बोले,
“हरिदास, तुम्हारी प्रार्थना मैंने सुन ली है। भूख सबसे बड़ा दुख है, और कोई भी निर्दोष भूखा न रहे — यही मेरा आदेश है।”
यह कहकर गणेश जी ने हरिदास को एक चमकता हुआ सोऩे का घड़ा दिया और कहा,
“यह घड़ा चमत्कारी है। इससे जो भी भोजन तुम सच्चे मन से माँगोगे, वही मिलेगा। लेकिन याद रखना — इसका उपयोग सिर्फ जरूरत और सेवा के लिए करना, लालच के लिए नहीं।”
इतना कहकर भगवान गणेश अंतर्ध्यान हो गए।
हरिदास की नींद खुल गई। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
चमत्कार की शुरुआत
सुबह जब उसने देखा, तो सचमुच उसके पास वही सोऩे का घड़ा रखा हुआ था। उसने घड़े से कहा,
“हमें आज सादा भोजन चाहिए।”
घड़े से तुरंत गर्म रोटियाँ, दाल और सब्ज़ी निकल आईं।
सीता की आँखों में खुशी के आँसू थे। बच्चों ने महीनों बाद भरपेट खाना खाया। उस दिन घर में खुशियाँ लौट आईं।
ढाबे की शुरुआत
कुछ समय बाद परिवार ने सोचा,
“अगर हम गाँव वालों को सस्ता और स्वादिष्ट खाना खिलाएँ, तो हमें रोज़ी-रोटी मिल जाएगी।”
उन्होंने गाँव के बाहर एक छोटा-सा ढाबा खोल लिया। सोने के घड़े से निकलने वाला खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि दूर-दूर से लोग आने लगे।
सब खाना सोऩे के घड़े से आता था।
धीरे-धीरे ढाबा मशहूर हो गया। पैसे आने लगे, घर बड़ा हो गया, कपड़े अच्छे हो गए।
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लालच का जन्म
लेकिन जैसे-जैसे पैसा बढ़ा, वैसे-वैसे परिवार का स्वभाव बदलने लगा।
अब वे गरीबों को मुफ्त खाना नहीं देते थे। जो माँगने आता, उसका मज़ाक उड़ाते।
हरिदास कहता,
“हमने बहुत मेहनत से ये सब कमाया है।”
सीता भी कहती,
“गरीबी उनकी अपनी किस्मत है।”
बच्चे भी गरीब बच्चों को चिढ़ाने लगे।
उन्हें यह याद ही नहीं रहा कि वे कभी खुद भूखे रहा करते थे।
भगवान गणेश का क्रोध
एक रात भगवान गणेश फिर से हरिदास के सपने में आए। इस बार उनका चेहरा गंभीर था।
उन्होंने कहा,
“हरिदास, मैंने तुम्हें सहारा दिया था। तुमने भूख मिटाने के लिए वरदान माँगा था, लेकिन उसे अहंकार और लालच में बदल दिया।”
हरिदास डर गया और बोला,
“प्रभु, हमने कुछ गलत नहीं किया।”
गणेश जी बोले,
“जिसने भूख देखी हो और फिर भूखे का मज़ाक उड़ाए, वह सबसे बड़ा अपराध करता है।”
यह कहकर गणेश जी ने सोऩे का घड़ा वापस ले लिया।
पुनः गरीबी
सुबह ढाबा नहीं खुला क्योंकि सोने का घड़ा भगवान गणेश वापस ले गए थे।
उन्होंने खुद भी खाना बनाकर बेचने की कोशिश की लेकिन वो स्वादिष्ट खाना नहीं बना पाए।
धीरे-धीरे उनके ढाबे पर लोगों ने आना बंद कर दिया और सब उनके खाने की बुराई करने लगे।
कुछ ही दिनों में जमा पूँजी खत्म हो गई। ढाबा बंद हो गया। घर फिर से खाली हो गया।
बच्चे फिर भूख से रोने लगे।
अब हरिदास को अपनी गलती समझ आ गई थी।
पश्चाताप और कर्मों का फल
हरिदास परिवार सहित मंदिर पहुँचा और रोते हुए बोला,
“हे गणेश जी, हमने अपने कर्मों से ही यह सज़ा पाई है। हमें माफ कर दीजिए।”
लेकिन इस बार कोई चमत्कार नहीं हुआ।
उन्हें समझ आ गया था —
भगवान सबको अवसर देते हैं, लेकिन जिनका घमंड हो जाता है उन पर से अपनी कृपा भी वापस ले लेते हैं।
अब हरिदास फिर मेहनत-मजदूरी करने लगा। अब वह गरीबों के दुख को समझता था।
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